Wednesday, October 7, 2020

विशाल शुक्ला जी की जन्म दिवस 08 अक्टूबर







 *जय महाकालेश्वर*

वेद, ज्योतिष, कर्मकांड व धर्मशास्त्र के विद्वान पं. विशाल शुक्ला जी को जन्म दिन की शुभकामनाएं🙏

इन्होंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया और कुछ पुस्तक भी प्रकाशित करना चाहा, लेकिन अर्थिक स्थित के कारण उनका सपना पूरा नहीं हो पाया। 


*यस्यास्ति वित्तं स नर: कुलीन:*

*स पंडित: स श्रुतवान् गुणज्ञ:।* 

*स एव वक्ता स च दर्शनीय:*

*सर्वे गुणा: कांचनमाश्रयन्ते॥*              - रंजन तिवारी

Friday, September 11, 2020

ब्राह्मण चित्रावली





























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कलियुग में अद्भुत विचार

 

1. *क़ाबिल लोग न तो किसी को दबाते हैं और न ही किसी से दबते हैं*।


2. *ज़माना भी अजीब हैं, नाकामयाब लोगो का मज़ाक उड़ाता हैं और कामयाब लोगो से जलता हैं*।


3. *कैसी विडंबना हैं ! कुछ लोग जीते-जी मर जाते हैं*, *और कुछ लोग मर कर भी अमर हो जाते हैं* 


4. *इज्जत किसी आदमी की नही जरूरत की होती हैं. जरूरत खत्म तो इज्जत खत्म*।


5. *सच्चा चाहने वाला आपसे प्रत्येक तरह की बात करेगा*. *आपसे हर मसले पर बात करेगा लेकिन*

*धोखा देने वाला सिर्फ प्यार भरी बात करेगा*।


6. *हर किसी को दिल में उतनी ही जगह दो जितनी वो देता हैं.. वरना या तो खुद रोओगे, या वो तुम्हें रूलाऐगा*


7. *खुश रहो लेकिन कभी संतुष्ट मत रहो*


8. *अगर जिंदगी में सफल होना हैं तो पैसों को हमेशा जेब में रखना, दिमाग में नही*


9. *इंसान अपनी कमाई के हिसाब से नही,अपनी जरूरत के हिसाब से गरीब होता हैं*


10. *जब तक तुम्हारें पास पैसा हैं, दुनिया पूछेगी भाई तू कैसा हैं*


11. *हर मित्रता के पीछे कोई न कोई स्वार्थ छिपा होता हैं ऐसी कोई भी मित्रता नही जिसके पीछे स्वार्थ न छिपा हो*


12. *दुनिया में सबसे ज्यादा सपने तोड़े हैं इस बात ने,कि लोग क्या कहेंगे*.. 


13. *जब लोग अनपढ़ थे तो परिवार एक हुआ करते थे, मैने टूटे परिवारों में अक्सर पढ़े-लिखे लोग देखे हैं*


14. *जन्मों-जन्मों से टूटे रिश्ते भी जुड़ जाते हैं बस सामने वाले को आपसे काम पड़ना चाहिए*


15. *हर प्रॉब्लम के दो सोल्युशन होते हैं.. भाग लो*..

*(run away) भाग लो*..

*(participate) पसंद आपको ही करना हैं*


16. *इस तरह से अपना व्यवहार रखना चाहिए कि अगर कोई तुम्हारे बारे में बुरा भी कहे, तो कोई भी उस पर विश्वास न करे*


17. *अपनी सफलता का रौब माता पिता को मत दिखाओ, उन्होनें अपनी जिंदगी हार के आपको जिताया हैं*


18. *यदि जीवन में लोकप्रिय होना हो तो सबसे ज्यादा ‘आप’ शब्द का, उसके बाद ‘हम’ शब्द का और सबसे कम ‘मैं’ शब्द का उपयोग करना चाहिए*


19. *इस दुनिया मे कोई किसी का हमदर्द नहीं होता, लाश को शमशान में रखकर अपने लोग ही पुछ्ते हैं.. और कितना वक़्त लगेगा*


20. *दुनिया के दो असम्भव काम- माँ की “ममता” और पिता की “क्षमता” का अंदाज़ा लगा पाना*


21. *कितना कुछ जानता होगा वो शख़्स मेरे बारे में जो मेरे मुस्कराने पर भी जिसने पूछ लिया कि तुम उदास क्यों हो*


22. *यदि कोई व्यक्ति आपको गुस्सा दिलाने मे सफल रहता हैं तो समझ लीजिये आप उसके हाथ की कठपुतली हैं*


23. *मन में जो हैं साफ-साफ कह देना चाहिए Q कि सच बोलने से फैसलें होते हैं और झूठ बोलने से फासलें*


24. *यदि कोई तुम्हें नजरअंदाज कर दे तो बुरा मत मानना, Q कि लोग अक्सर हैसियत से बाहर मंहगी चीज को नजरंअदाज कर ही देते हैं*


25. *संस्कारो से भरी कोई धन दौलत नही है*


26. *गलती कबूल़ करने और गुनाह छोङने में कभी देर ना करना, Q कि सफर जितना लंबा होगा वापसी उतनी ही मुशिकल हो जाती हैं*


27. *दुनिया में सिर्फ माँ-बाप ही ऐसे हैं जो बिना स्वार्थ के प्यार करते हैं*


28. *कोई देख ना सका उसकी बेबसी जो सांसें बेच रहा हैं गुब्बारों मे डालकर*


29. *घर आये हुए अतिथि का कभी अपमान मत करना, क्योकि अपमान तुम उसका करोगे और तुम्हारा अपमान समाज करेगा*


30. *जो भाग्य में हैं वह भाग कर आयेगा और जो भाग्य में नही हैं वह आकर भी भाग जायेगा*


31. *हँसते रहो तो दुनिया साथ हैं, वरना आँसुओं को तो आँखो में भी जगह नही मिलती*


32. *दुनिया में भगवान का संतुलन कितना अद्भुत हैं, 100 कि.ग्रा.अनाज का बोरा जो उठा सकता हैं वो खरीद नही सकता और जो खरीद सकता हैं वो उठा नही सकता*


33. *जब आप गुस्सें में हो तब कोई फैसला न लेना और जब आप खुश हो तब कोई वादा न करना (ये याद रखना कभी नीचा नही देखना पड़ेगा)*


34. *मेने कई अपनों को वास्तविक जीवन में शतरंज खेलते देखा है*


35. *जिनमें संस्कारो और आचरण की कमी होती हैं वही लोग दूसरे को अपने घर बुला कर नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं*


36. *मुझे कौन याद करेगा इस भरी दुनिया में, हे ईशवर बिना मतल़ब के तो लोग तुझे भी याद नही करते*


37. *अगर आप किसी को धोखा देने में कामयाब हो जाते हैं तो मान कर चलना की ऊपर वाला भी आपको धोखा देगा क्योकि उसके यहाँ हर बात का इन्साफ जरूर होता है।*

Saturday, August 29, 2020

जन्मकुंडली संबंधित ज्ञान



 https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLScUA_VrHDRYxfWL-URA8u1h29idmcD66hCSKRQD9v1yc1afrQ/viewform?usp=sf_link


*ज्योतिष के कुछ अद्भुत योग*


१. किसी जन्मकुंडली में लग्नेश और द्वितीयेश का स्थान परिवर्तन हो जाये ऐसी अवस्था मे जातक को कम प्रयत्न करने के बाद भी अच्छा धन प्राप्त होने के योग बनते हैं।


२. लग्नेश या द्वादश भाव मे बैठे तो "अवयोग" होता है ऐसे में जातक के शत्रु अधिक होंगे। जातक को जीवन मे कभी न कभी झूठे आरोप का सामना करना पड़ता हैं। जातक के मन मे कभी न कभी आत्महत्या करने जैसा विचार भी आता है।


३. लग्न का शुक्र जातक को गीत-संगीत का शौकीन, उत्तम  वस्त्र और वैभवशाली जीवन को और आकर्षित करने वाला होता है।


४. किसी कुंडली मे द्वितीय भाव का स्वामी नवम या एकादश भाव मे बैठा हो तो जातक का बाल्यकाल थोड़ा कष्टदायी होता है किंतु ऐसा जातक किशोरावस्था के बाद का सम्पूर्ण  जीवन बहुत सुख में व्यतीत करता है।


५.  किसी कुंडली मे अष्टमेश किसी भी भाव मे स्थित हो और अष्टमेश पर गुरु की दृष्टि पड़ रही हो तो ऐसे जातक की आयु बहुत लंबी होती है।


६.  यदि किसी कुंडली के एकादश भाव मे सूर्य स्थित हो तो ऐसे जातक के शत्रु बहुत अधिक होंगे,   लेकिन जातक हमेशा अपने शत्रुओं को पराजित करेगा।


७. किसी की कुंडली मे राहू की महादशा चल रही हो, उसमे केतु की अंतर्दशा का समय जातक के जीवन में बहुत सी उलझन और कष्ट देने वाला होता है।


८. किसी महिला जातिका की कुंडली मे राहू यदि द्वितीय भाव मे स्थित हो, ऐसी जातिका को अपने जन्मस्थान पर कभी भी खुशी या आनंद प्राप्त नही होता है। ऐसे में उसे अपने जन्मस्थान से अलग राज्य में रहना या विदेश में रहना उसके सुखद जीवन के लिए श्रेष्ठ होता है। यदि ऐसी जातिका अपने जन्मस्थान पर ही रहे तो सदैव दुखी या अशांत ही होगी।


९. किसी महिला जातिका की कुंडली मे सूर्य तृतीय भाव मे हो और शनि षष्ठ भाव मे हो तो ऐसी जातिका निश्चित तौर पर किसी बड़े धनवान व्यक्ति या बड़े अधिकारी की जीवनसाथी होगी।


१०. किसी कुंडली में शनि अपनी उच्च राशि "तुला" में स्थित हो तथा कही से भी मंगल से दृष्ट हो तो ऐसा जातक निसन्देह एक "अच्छा वक्ता" या "नेता" बनेगा ऐसे जातक मे नेतृत्व के गुण स्वतः ही विकसित होते हैं।


११. कुंडली मे शुक्र एकादश भाव मेंहो तो जातक विवाह के बाद धनवान होता है।


१२. यदि किसी जातक की कुंडली मे केतु अष्टम भाव मे हो तो ऐसा जातक अपने जीवनकाल में आकस्मिक रूप से धनलाभ प्राप्त करता है।


१३. यदि अष्टम भाव मे मेष, वृषभ, मिथुन, कन्या, अथवा वृश्चिक राशि हो तो ऐसे जातक को पेट से संबंधित व्याधियां भी होती है।


१४.  किसी जन्मकुंडली में शनि "वृषभ राशि" में हो तो ऐसा जातक क्रोधी प्रवृत्ति का होता है। जातक को क्रोध जल्दी आता हैं। ऐसे जातक को विवाह के बाद कुछ आर्थिक विषमताओ का भी सामना करना पड़ सकता है।


१५.  किसी कुंडली मे "चन्द्र्मा" को छोड़कर कोई अन्य ग्रह सूर्य के दोनों और कोई भी ग्रह हो ऐसा जातक वाणी का थोड़ा तेज या तीखी होगी, साथ ही ऐसा जातक अधिकांश कार्यो में सफल होकर धनवान भी होगा।


१६.  जन्म कुंडली मे लग्न स्थिर राशि (वृषभ, सिंह, वृश्चिक या कुंभ) हो और कही से भी छठे भाव के स्वामी की दृष्टी लग्न पर हो तो ऐसा जातक बहुत धनवान होकर अच्छी संपत्ति का स्वामी होता है।


१७.  कुंडली मे एकादशेश यदि लग्न में आकर बैठ जाये तो जातक को ग्यारस या महीने की 11 तारीख को कुछ विशेष लाभ होने की संभावना होती है।


१८. किसी कुंडली मे शनि लग्न में हो तथा गुरु, केंद्र में हो तो ऐसा जातक अपने जीवन काल मे पैतृक संपत्ति अवश्य प्राप्त करता है।


१९.  किसी कुंडली मे चन्द्रमा और बुध की युति केंद्र अथवा त्रिकोण में हो ऐसा जातक अत्यधिक विद्वान और बुद्धिमान होगा।


२०.  किसी कुंडली मे चन्द्रमा किसी उच्च राशिस्थ ग्रह से दृष्ट हो, तो जातक अपने जीवनकाल मे धनवान अवश्य होता है।




*जन्मपत्री में आकस्मिक दुर्घटना के योग* 

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ज्योतिष के दृष्टिकोण से कुछ विशेष ग्रह योग ही एक दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं तो आज हम एक्सीडैंट या दुर्घटना के पीछे की ग्रहस्थितियों के बारे में चर्चा करेंगे 


"ज्योतिष में "मंगल" को दुर्घटना, या चोट लगना, हड्डी टूटना, जैसी घटनाओं का कारक ग्रह माना गया है "राहु" आकस्मिक घटनाओं को नियंत्रित करता है इसके आलावा "शनि" वाहन को प्रदर्शित करता है तथा गम्भीर स्थितियों का प्रतिनिधित्व करता है अब यहाँ विशेष बात यह है के अकेला राहु या शनि दुर्घटना की उत्पत्ति नहीं करते जब इनका किसी प्रकार मंगल के साथ योग होता है तो उस समय में दुर्घटनाओं की स्थिति बनती है। शनि,मंगल और राहु,मंगल का योग एक विध्वंसकारी योग होता है जो बड़ी दुर्घटनाओं को उत्पन्न करता है। जिस समय गोचर में शनि और मंगल एक ही राशि में हो, आपस में राशि परिवर्तन कर रहे हों या षडाष्टक योग बना रहे हों तो ऐसे समय में एक्सीडैंट और सड़क हादसों की संख्या बहुत बढ़ जाती है ऐसा ही राहु मंगल के योग से भी होता है। जिन व्यक्तियों की कुंडली में शनि,मंगल और राहु,मंगल का योग होता है उन्हें जीवन में बहुत बार दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है अतः ऐसे व्यक्तियों को वाहन आदि का उपयोग बहुत सजगता से करना चाहिए। किसी व्यक्ति के साथ दुर्घटना होने में उस समय के गौचर ग्रहों और ग्रह दशाओं की बड़ी भूमिका होती है जिसकी चर्चा हम आगे कर रहें हैं"


*कुछ विशेष योग* 


1. यदि कुंडली में शनि मंगल का योग हो और शुभ प्रभाव से वंछित हो तो जीवन में चोट लगने और दुर्घटनाओं की स्थिति बार बार बनती है।

2. शनि मंगल का योग यदि अष्टम भाव में बने तो अधिक हानिकारक होता है ऐसे व्यक्ति को वाहन बहुत सावधानी से प्रयोग करना चाहिए।

3. यदि कुंडली में शनि और मंगल का राशि परिवर्तन हो रहा हो तब भी चोट आदि लगने की समस्या समय समय पर आती है।

4. कुंडली में राहु, मंगल की युति भी दुर्घटनाओं को बार बार जन्म देती है यह योग अष्टम भाव में बनने पर बहुत समस्या देता है।

5. यदि मंगल कुंडली के आठवें भाव में हो तो भी एक्सीडेंट आदि की घटनाएं बहुत सामने आती हैं।

6. मंगल का नीच राशि (कर्क) में होना तथा मंगल केतु का योग भी बार बार दुर्घटनाओं का सामना कराता है।


   *दुर्घटना काल*


एक्सीडैंट की घटनाएं कुछ विशेष ग्रहस्थिति और दशाओं में बनती हैं

1. व्यक्ति की कुंडली में मंगल जिस राशि में हो उस राशि में जब शनि गोचर करता है तो ऐसे में एक्सीडैंट की सम्भावना बनती हैं।

2. कुंडली में शनि जिस राशि में हो उस राशि में मंगल गोचरवश जब आता है तब चोट आदि लगने की सम्भावना होती है।

3. जब कुंडली में मंगल जिस राशि में हो उसमे राहु गोचर करे या राहु जिस राशि में कुंडली में स्थित हो उसमे मंगल गोचर करे तो भी एक्सीडैंट की स्थिति बनती है।

4. जब जन्मकुंडली में दशावश राहु और मंगल का योग हो अर्थात राहु और मंगल की दशाएं एक साथ चल रही हों ( राहु में मंगल या मंगल में राहु ) तो भी एक्सीडेंट होने का योग बनता है ऐसे समय में वाहन चलाने में सतर्कता बरतनी चाहिए।


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     *॥ जय माँ आदिशक्ति॥*

Sunday, April 26, 2020

परशुराम




ॐ परशुरामाय नम: जमदग्निनंदन परशुराम जी की शुभ जयंती निजी रुप से मनाया गया। प्रभु परशुराम इस संकट की घड़ी(महामारी) में हम सब की रक्षा करें। *जय परशुराम* ॐ

परशुराम त्रेता युग (रामायण काल) में एक ब्राह्मण ऋषि के यहां जन्मे थे। जो विष्णु के छठा अवतार हैं। पौरोणिक वृत्तान्तों के अनुसार उनका जन्म महर्षि भृगु के वंश में महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को मध्यप्रदेश के इंदौर जिला में ग्राम मानपुर के जानापाव पर्वत में हुआ। वे भगवान विष्णु के आवेशावतार हैं। पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम कहलाए। वे जमदग्नि का पुत्र होने के कारण जामदग्न्य और शिवजी द्वारा प्रदत्त परशु धारण किये रहने के कारण वे परशुराम कहलाये। आरम्भिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से शार्ङ्ग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्राप्त हुआ। तदनन्तर कैलाश गिरिश्रृंग पर स्थित भगवान शंकर के आश्रम में विद्या प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया। शिवजी से उन्हें श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए। चक्रतीर्थ में किये कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया।वे शस्त्रविद्या के महान गुरु थे। उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। उन्होंने एकादश छन्दयुक्त "शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र" भी लिखा। इच्छित फल-प्रदाता परशुराम गायत्री है-"ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि, तन्नोपरशुराम: प्रचोदयात्।" वे पुरुषों के लिये आजीवन एक पत्नीव्रत के पक्षधर थे। उन्होंने अत्रि की पत्नी अनसूया, अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा व अपने प्रिय शिष्य अकृतवण के सहयोग से विराट नारी-जागृति-अभियान का संचालन भी किया था। अवशेष कार्यो में कल्कि अवतार होने पर उनका गुरुपद ग्रहण कर उन्हें शस्त्रविद्या प्रदान करना भी बताया गया है।परशुरामजी का उल्लेख रामायण, महाभारत, भागवत पुराण और कल्कि पुराण इत्यादि अनेक ग्रन्थों में किया गया है। वे अहंकारी और धृष्ट हैहय वंशी क्षत्रियों का पृथ्वी से २१ बार संहार करने के लिए प्रसिद्ध हैं। वे धरती पर वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे। कहा जाता है कि भारत के अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाये गये। जिस मे कोंकण, गोवा एवं केरल का समावेपरशुरामजी का उल्लेख रामायण, महाभारत, भागवत पुराण और कल्कि पुराण इत्यादि अनेक ग्रन्थों में किया गया है। वे अहंकारी और धृष्ट हैहय वंशी क्षत्रियों का पृथ्वी से २१ बार संहार करने के लिए प्रसिद्ध हैं। वे धरती पर वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहते । कहा जाता है कि भारत के अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाये गये। जिस मे कोंकण, गोवा एवं केरल का समावेश है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान परशुराम ने तिर चला कर गुजरात से लेकर केरला तक समुद्र को पिछे धकेल ते हुए नई भूमि का निर्माण किया। और इसी कारण कोंकण, गोवा और केरला मे भगवान परशुराम वंदनीय है। वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकारी सन्तानों में से एक थे, जो सदैव अपने गुरुजनों और माता पिता की आज्ञा का पालन करते थे। वे सदा बड़ों का सम्मान करते थे और कभी भी उनकी अवहेलना नहीं करते थे। उनका भाव इस जीव सृष्टि को इसके प्राकृतिक सौंदर्य सहित जीवन्त बनाये रखना था। वे चाहते थे कि यह सारी सृष्टि पशु पक्षियों, वृक्षों, फल फूल औए समूची प्रकृति के लिए जीवन्त रहे। उनका कहना था कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है नाकि अपनी प्रजा से आज्ञापालन करवाना। वे एक ब्राह्मण के रूप में जन्में अवश्य थे लेकिन कर्म से एक क्षत्रिय थे। उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है।

यह भी ज्ञात है कि परशुराम ने अधिकांश विद्याएँ अपनी बाल्यावस्था में ही अपनी माता की शिक्षाओं से सीख ली थीँ (वह शिक्षा जो ८ वर्ष से कम आयु वाले बालको को दी जाती है)। वे पशु-पक्षियों तक की भाषा समझते थे और उनसे बात कर सकते थे। यहाँ तक कि कई खूँख्वार वनैले पशु भी उनके स्पर्श मात्र से ही उनके मित्र बन जाते थे।

उन्होंने सैन्यशिक्षा केवल ब्राह्मणों को ही दी। लेकिन इसके कुछ अपवाद भी हैं जैसे भीष्म और कर्ण।

उनके जाने-माने शिष्य थे -

भीष्म
द्रोण, कौरव-पाण्डवों के गुरु व अश्वत्थामा के पिता एवं
कर्ण।
कर्ण को यह ज्ञात नहीं था कि वह जन्म से क्षत्रिय है। वह सदैव ही स्वयं को शुद्र समझता रहा लेकिन उसका सामर्थ्य छुपा न रह सका। उन्होन परशुराम को यह बात नहीं बताई की वह शुद्र वर्ण के है। और भगवान परशुराम से शिक्षा प्राप्त कर ली। किन्तु परशुराम वर्ण व्यवस्था को अनुचित मानते थे। यदि कर्ण उन्हे अपने शुद्र होने की बात बता भी देते तो भी भगवान परशुराम कर्ण के तेज और सामर्थ्य को देख उन्हे सहर्ष शिक्षा देने को तैयार हो जाते। किन्तु जब परशुराम को इसका ज्ञान हुआ तो उन्होंने कर्ण को यह श्राप दिया की उनका सिखाया हुआ सारा ज्ञान उसके किसी काम नहीं आएगा जब उसे उसकी सर्वाधिक आवश्यकता होगी। इसलिए जब कुरुक्षेत्र के युद्ध में कर्ण और अर्जुन आमने सामने होते है तब वह अर्जुन द्वारा मार दिया जाता है क्योंकि उस समय कर्ण को ब्रह्मास्त्र चलाने का ज्ञान ध्यान में ही नहीं रहा।श है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान परशुराम ने तिर चला कर गुजरात से लेकर केरला तक समुद्र को पिछे धकेल ते हुए नई भूमि का निर्माण किया। और इसी कारण कोंकण, गोवा और केरला मे भगवान परशुराम वंदनीय है। वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकारी सन्तानों में से एक थे, जो सदैव अपने गुरुजनों और माता पिता की आज्ञा का पालन करते थे। वे सदा बड़ों का सम्मान करते थे और कभी भी उनकी अवहेलना नहीं करते थे। उनका भाव इस जीव सृष्टि को इसके प्राकृतिक सौंदर्य सहित जीवन्त बनाये रखना था। वे चाहते थे कि यह सारी सृष्टि पशु पक्षियों, वृक्षों, फल फूल औए समूची प्रकृति के लिए जीवन्त रहे। उनका कहना था कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है नाकि अपनी प्रजा से आज्ञापालन करवाना। वे एक ब्राह्मण के रूप में जन्में अवश्य थे लेकिन कर्म से एक क्षत्रिय थे। उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है।

यह भी ज्ञात है कि परशुराम ने अधिकांश विद्याएँ अपनी बाल्यावस्था में ही अपनी माता की शिक्षाओं से सीख ली थीँ (वह शिक्षा जो ८ वर्ष से कम आयु वाले बालको को दी जाती है)। वे पशु-पक्षियों तक की भाषा समझते थे और उनसे बात कर सकते थे। यहाँ तक कि कई खूँख्वार वनैले पशु भी उनके स्पर्श मात्र से ही उनके मित्र बन जाते थे।

उन्होंने सैन्यशिक्षा केवल ब्राह्मणों को ही दी। लेकिन इसके कुछ अपवाद भी हैं जैसे भीष्म और कर्ण।

उनके जाने-माने शिष्य थे -

भीष्म
द्रोण, कौरव-पाण्डवों के गुरु व अश्वत्थामा के पिता एवं
कर्ण।
कर्ण को यह ज्ञात नहीं था कि वह जन्म से क्षत्रिय है। वह सदैव ही स्वयं को शुद्र समझता रहा लेकिन उसका सामर्थ्य छुपा न रह सका। उन्होन परशुराम को यह बात नहीं बताई की वह शुद्र वर्ण के है। और भगवान परशुराम से शिक्षा प्राप्त कर ली। किन्तु परशुराम वर्ण व्यवस्था को अनुचित मानते थे। यदि कर्ण उन्हे अपने शुद्र होने की बात बता भी देते तो भी भगवान परशुराम कर्ण के तेज और सामर्थ्य को देख उन्हे सहर्ष शिक्षा देने को तैयार हो जाते। किन्तु जब परशुराम को इसका ज्ञान हुआ तो उन्होंने कर्ण को यह श्राप दिया की उनका सिखाया हुआ सारा ज्ञान उसके किसी काम नहीं आएगा जब उसे उसकी सर्वाधिक आवश्यकता होगी। इसलिए जब कुरुक्षेत्र के युद्ध में कर्ण और अर्जुन आमने सामने होते है तब वह अर्जुन द्वारा मार दिया जाता है क्योंकि उस समय कर्ण को ब्रह्मास्त्र चलाने का ज्ञान ध्यान में ही नहीं रहा।प्राचीन काल में कन्नौज में गाधि नाम के एक राजा राज्य करते थे। उनकी सत्यवती नाम की एक अत्यन्त रूपवती कन्या थी। राजा गाधि ने सत्यवती का विवाह भृगुनन्दन ऋषीक के साथ कर दिया। सत्यवती के विवाह के पश्‍चात् वहाँ भृगु ऋषि ने आकर अपनी पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया और उससे वर माँगने के लिये कहा। इस पर सत्यवती ने श्‍वसुर को प्रसन्न देखकर उनसे अपनी माता के लिये एक पुत्र की याचना की। सत्यवती की याचना पर भृगु ऋषि ने उसे दो चरु पात्र देते हुये कहा कि जब तुम और तुम्हारी माता ऋतु स्नान कर चुकी हो तब तुम्हारी माँ पुत्र की इच्छा लेकर पीपल का आलिंगन करना और तुम उसी कामना को लेकर गूलर का आलिंगन करना। फिर मेरे द्वारा दिये गये इन चरुओं का सावधानी के साथ अलग अलग सेवन कर लेना। इधर जब सत्यवती की माँ ने देखा कि भृगु ने अपने पुत्रवधू को उत्तम सन्तान होने का चरु दिया है तो उसने अपने चरु को अपनी पुत्री के चरु के साथ बदल दिया। इस प्रकार सत्यवती ने अपनी माता वाले चरु का सेवन कर लिया। योगशक्‍ति से भृगु को इस बात का ज्ञान हो गया और वे अपनी पुत्रवधू के पास आकर बोले कि पुत्री! तुम्हारी माता ने तुम्हारे साथ छल करके तुम्हारे चरु का सेवन कर लिया है। इसलिये अब तुम्हारी सन्तान ब्राह्मण होते हुये भी क्षत्रिय जैसा आचरण करेगी और तुम्हारी माता की सन्तान क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण जैसा आचरण करेगी। इस पर सत्यवती ने भृगु से विनती की कि आप आशीर्वाद दें कि मेरा पुत्र ब्राह्मण का ही आचरण करे, भले ही मेरा पौत्र क्षत्रिय जैसा आचरण करे। भृगु ने प्रसन्न होकर उसकी विनती स्वीकार कर ली। समय आने पर सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि का जन्म हुआ। जमदग्नि अत्यन्त तेजस्वी थे। बड़े होने पर उनका विवाह प्रसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ। रेणुका से उनके पाँच पुत्र हुए जिनके नाम थे - रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्‍वानस और परशुराम।[श्रीमद्भागवत में दृष्टान्त है कि गन्धर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार करता देख हवन हेतु गंगा तट पर जल लेने गई रेणुका आसक्त हो गयी और कुछ देर तक वहीं रुक गयीं। हवन काल व्यतीत हो जाने से क्रुद्ध मुनि जमदग्नि ने अपनी पत्नी के आर्य मर्यादा विरोधी आचरण एवं मानसिक व्यभिचार करने के दण्डस्वरूप सभी पुत्रों को माता रेणुका का वध करने की आज्ञा दी।

अन्य भाइयों द्वारा ऐसा दुस्साहस न कर पाने पर पिता के तपोबल से प्रभावित परशुराम ने उनकी आज्ञानुसार माता का शिरोच्छेद एवं उन्हें बचाने हेतु आगे आये अपने समस्त भाइयों का वध कर डाला। उनके इस कार्य से प्रसन्न जमदग्नि ने जब उनसे वर माँगने का आग्रह किया तो परशुराम ने सभी के पुनर्जीवित होने एवं उनके द्वारा वध किए जाने सम्बन्धी स्मृति नष्ट हो जाने का ही वर माँगा।कथानक है कि हैहय वंशाधिपति का‌र्त्तवीर्यअर्जुन (सहस्त्रार्जुन) ने घोर तप द्वारा भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न कर एक सहस्त्र भुजाएँ तथा युद्ध में किसी से परास्त न होने का वर पाया था। संयोगवश वन में आखेट करते वह जमदग्निमुनि के आश्रम जा पहुँचा और देवराज इन्द्र द्वारा उन्हें प्रदत्त कपिला कामधेनु की सहायता से हुए समस्त सैन्यदल के अद्भुत आतिथ्य सत्कार पर लोभवश जमदग्नि की अवज्ञा करते हुए कामधेनु को बलपूर्वक छीनकर ले गया।

कुपित परशुराम ने फरसे के प्रहार से उसकी समस्त भुजाएँ काट डालीं व सिर को धड़ से पृथक कर दिया। तब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोध स्वरूप परशुराम की अनुपस्थिति में उनके ध्यानस्थ पिता जमदग्नि की हत्या कर दी। रेणुका पति की चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयीं। इस काण्ड से कुपित परशुराम ने पूरे वेग से महिष्मती नगरी पर आक्रमण कर दिया और उस पर अपना अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक पूरे इक्कीस बार इस पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश किया। यही नहीं उन्होंने हैहय वंशी क्षत्रियों के रुधिर से स्थलत पंचक क्षेत्र के पाँच सरोवर भर दिये और पिता का श्राद्ध सहस्त्रार्जुन के पुत्रों के रक्त से किया। अन्त में महर्षि ऋचीक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोका।

इसके पश्चात उन्होंने अश्वमेघ महायज्ञ किया और सप्तद्वीप युक्त पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर दी। केवल इतना ही नहीं, उन्होंने देवराज इन्द्र के समक्ष अपने शस्त्र त्याग दिये और सागर द्वारा उच्छिष्ट भूभाग महेन्द्र पर्वत पर आश्रम बनाकर रहने लगे।माना जाता है कि परशुराम ने 21 बार हैहयवंशी क्षत्रियों को समूल नष्ट किया था। क्षत्रियों का एक वर्ग है जिसे हैहयवंशी समाज कहा जाता है यह समाज आज भी है। इसी समाज में एक राजा हुआ था सहस्त्रार्जुन। परशुराम ने इसी राजा और इसके पुत्र और पौत्रों का वध किया था और उन्हें इसके लिए 21 बार युद्ध करना पड़ा था।

कौन था सहस्त्रार्जुन ?: सहस्त्रार्जुन एक चन्द्रवंशी राजा था जिसके पूर्वज थे महिष्मन्त। महिष्मन्त ने ही नर्मदा के किनारे महिष्मती नामक नगर बसाया था। इन्हीं के कुल में आगे चलकर दुर्दुम के उपरान्त कनक के चार पुत्रों में सबसे बड़े कृतवीर्य ने महिष्मती के सिंहासन को सम्हाला। भार्गव वंशी ब्राह्मण इनके राज पुरोहित थे। भार्गव प्रमुख जमदग्नि ॠषि (परशुराम के पिता) से कृतवीर्य के मधुर सम्बन्ध थे। कृतवीर्य के पुत्र का नाम भी अर्जुन था। कृतवीर्य का पुत्र होने के कारण ही उन्हें कार्त्तवीर्यार्जुन भी कहा जाता है। कार्त्तवीर्यार्जुन ने अपनी अराधना से भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न किया था। भगवान दत्तात्रेय ने युद्ध के समय कार्त्तवीर्याजुन को हजार हाथों का बल प्राप्त करने का वरदान दिया था, जिसके कारण उन्हें सहस्त्रार्जुन या सहस्रबाहु कहा जाने लगा। सहस्त्रार्जुन के पराक्रम से रावण भी घबराता था।

युद्ध का कारण: ऋषि वशिष्ठ से शाप का भाजन बनने के कारण सहस्त्रार्जुन की मति मारी गई थी। सहस्त्रार्जुन ने परशुराम के पिता जमदग्नि के आश्रम में एक कपिला कामधेनु गाय को देखा और उसे पाने की लालसा से वह कामधेनु को बलपूर्वक आश्रम से ले गया। जब परशुराम को यह बात पता चली तो उन्होंने पिता के सम्मान के खातिर कामधेनु वापस लाने की सोची और सहस्त्रार्जुन से उन्होंने युद्ध किया। युद्ध में सहस्त्रार्जुन की सभी भुजाएँ कट गईं और वह मारा गया।

तब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोधवश परशुराम की अनुपस्थिति में उनके पिता जमदग्नि को मार डाला। परशुराम की माँ रेणुका पति की हत्या से विचलित होकर उनकी चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयीं। इस घोर घटना ने परशुराम को क्रोधित कर दिया और उन्होंने संकल्प लिया-"मैं हैहय वंश के सभी क्षत्रियों का नाश करके ही दम लूँगा"। उसके बाद उन्होंने अहंकारी और दुष्ट प्रकृति के हैहयवंशी क्षत्रियों से 21 बार युद्ध किया। क्रोधाग्नि में जलते हुए परशुराम ने सर्वप्रथम हैहयवंशियों की महिष्मती नगरी पर अधिकार किया तदुपरान्त कार्त्तवीर्यार्जुन का वध। कार्त्तवीर्यार्जुन के दिवंगत होने के बाद उसके पाँच पुत्र जयध्वज, शूरसेन, शूर, वृष और कृष्ण अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते रहे।
परशुराम अति क्रोधी स्वभाव के माने जाते थे। एक बार ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच युद्ध हुआ जिसमें ब्राह्मणों की हार हुई। इसका बदला लेने के लिए स्वयं परशुराम जी ने लाखों क्षत्रियों को मार डाला। ब्रह्मवैवर्त पुराण में कथानक मिलता है कि कैलाश स्थित भगवान शंकर के अन्त:पुर में प्रवेश करते समय गणेश जी द्वारा रोके जाने पर परशुराम ने बलपूर्वक अन्दर जाने की चेष्ठा की। तब गणपति ने उन्हें स्तम्भित कर अपनी सूँड में लपेटकर समस्त लोकों का भ्रमण कराते हुए गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन कराके भूतल पर पटक दिया। चेतनावस्था में आने पर कुपित परशुरामजी द्वारा किए गए फरसे के प्रहार से गणेश जी का एक दाँत टूट गया, जिससे वे एकदन्त कहलाये।उन्होंने त्रेतायुग में रामावतार के समय शिवजी का धनुष भंग होने पर आकाश-मार्ग द्वारा मिथिलापुरी पहुँच कर प्रथम तो स्वयं को "विश्व-विदित क्षत्रिय कुल द्रोही" बताते हुए "बहुत भाँति तिन्ह आँख दिखाये" और क्रोधान्ध हो "सुनहु राम जेहि शिवधनु तोरा, सहसबाहु सम सो रिपु मोरा" तक कह डाला। तदुपरान्त अपनी शक्ति का संशय मिटते ही वैष्णव धनुष श्रीराम को सौंप दिया और क्षमा याचना करते हुए "अनुचित बहुत कहेउ अज्ञाता, क्षमहु क्षमामन्दिर दोउ भ्राता" तपस्या के निमित्त वन को लौट गये। रामचरित मानस की ये पंक्तियाँ साक्षी हैं- "कह जय जय जय रघुकुलकेतू, भृगुपति गये वनहिं तप हेतू"। वाल्मीकि रामायण में वर्णित कथा के अनुसार दशरथनन्दन श्रीराम ने जमदग्नि कुमार परशुराम का पूजन किया और परशुराम ने रामचन्द्र की परिक्रमा कर आश्रम की ओर प्रस्थान किया।

जाते जाते भी उन्होंने श्रीराम से उनके भक्तों का सतत सान्निध्य एवं चरणारविन्दों के प्रति सुदृढ भक्ति की ही याचना की थी।भीष्म द्वारा स्वीकार न किये जाने के कारण अंबा प्रतिशोध वश सहायता माँगने के लिये परशुराम के पास आयी। तब सहायता का आश्वासन देते हुए उन्होंने भीष्म को युद्ध के लिये ललकारा। उन दोनों के बीच २३ दिनों तक घमासान युद्ध चला। किन्तु अपने पिता द्वारा इच्छा मृत्यु के वरदान स्वरुप परशुराम उन्हें हरा न सके।

परशुराम अपने जीवन भर की कमाई ब्राह्मणों को दान कर रहे थे, तब द्रोणाचार्य उनके पास पहुँचे। किन्तु दुर्भाग्यवश वे तब तक सब कुछ दान कर चुके थे। तब परशुराम ने दयाभाव से द्रोणचार्य से कोई भी अस्त्र-शस्त्र चुनने के लिये कहा। तब चतुर द्रोणाचार्य ने कहा कि मैं आपके सभी अस्त्र शस्त्र उनके मन्त्रों सहित चाहता हूँ ताकि जब भी उनकी आवश्यकता हो, प्रयोग किया जा सके। परशुरामजी ने कहा-"एवमस्तु!" अर्थात् ऐसा ही हो। इससे द्रोणाचार्य शस्त्र विद्या में निपुण हो गये।

परशुराम कर्ण के भी गुरु थे। उन्होने कर्ण को भी विभिन्न प्रकार कि अस्त्र शिक्षा दी थी और ब्रह्मास्त्र चलाना भी सिखाया था। लेकिन कर्ण एक सूत का पुत्र था, फिर भी यह जानते हुए कि परशुराम केवल ब्राह्मणों को ही अपनी विधा दान करते हैं, कर्ण ने छल करके परशुराम से विधा लेने का प्रयास किया। परशुराम ने उसे ब्राह्मण समझ कर बहुत सी विद्यायें सिखायीं, लेकिन एक दिन जब परशुराम एक वृक्ष के नीचे कर्ण की गोदी में सर रखके सो रहे थे, तब एक भौंरा आकर कर्ण के पैर पर काटने लगा, अपने गुरुजी की नींद में कोई अवरोध न आये इसलिये कर्ण भौंरे को सेहता रहा, भौंरा कर्ण के पैर को बुरी तरह काटे जा रहा था, भौरे के काटने के कारण कर्ण का खून बहने लगा। वो खून बहता हुआ परशुराम के पैरों तक जा पहुँचा। परशुराम की नींद खुल गयी और वे इस खून को तुरन्त पहचान गये कि यह खून तो किसी क्षत्रिय का ही हो सकता है जो इतनी देर तक बगैर उफ़ किये बहता रहा। इस घटना के कारण कर्ण को अपनी अस्त्र विद्या का लाभ नहीं मिल पाया।

एक अन्य कथा के अनुसार एक बार गुरु परशुराम कर्ण की एक जंघा पर सिर रखकर सो रहे थे। तभी एक बिच्छू कहीं से आया और कर्ण की जंघा पर घाव बनाने लगा। किन्तु गुरु का विश्राम भंग ना हो, इसलिये कर्ण बिच्छू के दंश को सहता रहा। अचानक परशुराम की निद्रा टूटी और ये जानकर की एक ब्राम्हण पुत्र में इतनी सहनशीलता नहीं हो सकती कि वो बिच्छू के दंश को सहन कर ले। कर्ण के मिथ्याभाषण पर उन्होंने उसे ये श्राप दे दिया कि जब उसे अपनी विद्या की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, तब वह उसके काम नहीं भगवान परशुराम शस्त्र विद्या के श्रेष्ठ जानकार थे। परशुराम केरल के मार्शल आर्ट कलरीपायट्टु की उत्तरी शैली वदक्कन कलरी के संस्थापक आचार्य एवं आदि गुरु हैं। वदक्कन कलरी अस्त्र-शस्त्रों की प्रमुखता वाली शैली है।संबंध
स्वयं भगवान
निवासस्थान
महेन्द्रगिरि
अस्त्र
परशु (फरसा)
जीवनसाथी
धारिणी
शास्त्र
भागवत पुराण, विष्णु पुराण, रामायण, रामचरितमानसआयेगी।
                      - ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या
                   पं. श्री संतोष तिवारी 

Sunday, September 8, 2019

नौकरी कब मिलेगी



शास्त्रों के अनुसार ग्रहों का मानव शरीर पर किसी न किसी रूप में प्रभाव पड़ते हैं। ये प्रभाव प्रतिकूल या अनुकूल हो सकते हैं। मानव की सभी क्रियाएं, कमोबेश, इन ग्रहों के द्वारा संचालित होती हैं। नौ ग्रहों में किस ग्रह की महादशा और अंतर्दशा में नौकरी मिलेगी इसका विस्तृत विवरण यहां प्रस्तुत है। 1. लग्न के स्वामी की दशा और अंतर्दशा में 2. नवमेश की दशा या अंतर्दशा में 3. षष्ठेश की दशा या, अंतर्दशा में 3. प्रथम, षष्ठम, नवम और दशम भावों में स्थित ग्रहों की दशा या अंतर्दशा में 4. राहु और केतु की दशा, या अंतर्दशा में 5. दशमेश की दशा या अंतर्दशा में 6. द्वितीयेश और एकादशेश की दशा या अंतर्दशा में पहले नियम में लग्नेश की दशा या अंतर्दशा का विचार किया गया है। इसका मुख्य कारण यह है कि लग्न शरीर माना जाता है। नवम भाव भाग्य का भाव माना जाता है। भाग्य का बलवान होना अति आवश्यक है। अतः नवमेश की दशो या अंतर्दशा में भी नौकरी मिल सकती है। छठा भाव प्रतियोगिता का भाव माना जाता है। दशम भाव से नवम अर्थात भाग्य और नवम भाव से दशम अर्थात व्यवसाय का निर्देश करता है, अतः षष्ठेश की दशा या अंतर्दशा में भी नौकरी मिल सकती है। जो ग्रह प्रथम, षष्ठम, नवम और दशम में स्थित हों वे भी अपनी दशा, या अंतर्दशा में नौकरी दे सकते हंै। जीवन की कोई भी शुभ या अशुभ घटना राहु और केतु की दशा या अंतर्दशा में घटित हो सकती है। यह घटना राहु या केतु का संबंध किसी भाव से कैसा (शुभ या अशुभ) है इस पर निर्भर करती है। दशम भाव व्यवसाय का भाव माना जाता है। अतः दशमेश की दशा या अंतर्दशा में नौकरी मिल सकती है। एकादश भाव धन लाभ का और दूसरा धन का माना जाता है। अतः द्वितीयेश और एकादशेश की दशा या अंतर्दशा में भी नौकरी मिल सकती है। ग्रहों का गोचर भी महत्वपूर्ण घटना में अपना योगदान देता है। गोचर: गुरु गोचर में दशम या दशमेश से नौकरी मिलने के समय केंद्र या त्रिकोण में होता है। -अगर जातक का लग्न मेष, मिथुन, सिंह, वृश्चिक, वृष, या तुला हो, तो जब भी शनि और गुरु एक-दूसरे से केंद्र, या त्रिकोण में हों, तो नौकरी मिल सकती है, अर्थात नौकरी मिलने के समय शनि और गुरु का एक-दूसरे से केंद्र या त्रिकोण में होना अति आवश्यक है। -नौकरी मिलने के समय शनि या गुरु का या दोनों का दशम भाव और दशमेश दोनों से या किसी एक से संबंध होता है। - नौकरी मिलने के समय शनि और राहु एक-दूसरे से केंद्र या त्रिकोण में होते हैं। -नौकरी मिलने के समय जिस ग्रह की दशा और अंतर्दशा चल रही है उसका संबंध किसी तरह दशम भाव या दशमेश से या दोनों से होता है। उदाहरण के लिए यहां कुछ कुंडलियां प्रस्तुत हैं। उदाहरण 1: जातक का जन्म 7.5.1976 को हुआ। भोग्य दशा बुध की 5 वर्ष 8 महीना 3 दिन है। 10.1.1989 से शुक्र की महादशा चल रही है। 10.5.1993 से 10.1.1995 तक शुक्र की दशा में चंद्रमा की अंतर्दशा रही। जातक को नौकरी जून, 1994 में मिली। दशमेश शुक्र नवम भाव में बैठा है। यह नियम 4 तथा 6 को सत्य साबित कर रहा है। अंतर्दशा स्वामी चंद्रमा द्वादश भाव का स्वामी होकर द्वादश में बैठा है। अंतर्दशा स्वामी बताए गये किसी नियम को सत्य साबित नहीं कर रहा है। नौकरी मिलने के समय गुरु (वक्री) तृतीय भाव में तथा शनि सप्तम भाव में बैठा था। राहु भी तृतीय भाव में बैठा था। गोचर के प्रथम नियम के अनुसार नौकरी मिलने के समय गुरु दशम भाव या दशमेश से केंद्र या त्रिकोण में होना चाहिए। उस समय गुरु तृतीय भाव में था जो दशमेश शुक्र से केंद्र में है। गुरु वक्री होने के कारण दशम से त्रिकोण में है। जातक का जन्म सिंह लग्न में हुआ। नौकरी के समय गुरु तृतीय भाव में तथा शनि सप्तम भाव में है जो एक-दूसरे से त्रिकोण मेें हैं। इस प्रकार गोचर का दूसरा नियम सत्य साबित हुआ। गोचर में शनि सप्तम भाव में दशमेश शुक्र पर दृष्टि डाल रहा है और तृतीय भाव से गुरु शुक्र को देख रहा है। यह गोचर नियम तीन को सत्य साबित कर रहा है। राहु तृतीय भाव में तथा शनि सप्तम भाव में गोचर मंे हैं जो एक-दूसरे से त्रिकोण में हैं। यह गोचर नियम चार को सत्य साबित कर रहा है। उदाहरण 2: जातक का जन्म 16.4.1969 को हुआ। जन्म के समय केतु की भोग्य विंशोत्तरी दशा 6 वर्ष 9 महीना 5 दिन है। जातक को नौकरी फरवरी 2000 में मिली। सूर्य की महादशा 21.1.1996 से आरंभ हुई। नौकरी के समय सूर्य की दशा और बुध की अंतर्दशा थी। दशमेश सूर्य षष्ठ भाव में बैठा हुआ है। एकादशेश बुध षष्ठ भाव में बैठा हुआ है। नियम 6 और 7 तथा 4 सत्य साबित हुआ। नौकरी मिलने के समय शनि और गुरु गोचर से छठे भाव में दशमेश के साथ बैठे हंै। यह गोचर नियम प्रथम को सत्य साबित कर रहा है। जातक का लग्न वृश्चिक है और गोचर में शनि और गुरु एक साथ अर्थात एक-दूसरे से केंद्र में हैं। गोचर नियम 2 सत्य साबित हुआ। गोचर से नौकरी मिलने के समय राहु नवम भाव में है, जो गोचर शनि से केंद्र में हुआ। गोचर नियम 4 सत्य साबित हुआ। दशमेश सूर्य बुध के साथ छठे भाव में है। इस प्रकार दशानाथ सूर्य और अंतर्दशानाथ बुध का पारस्परिक संबंध हुआ। गोचर नियम पांच सत्य साबित हुआ। उदाहरण 3: तीसरी कुंडली के अनुसार जातक का जन्म 26.5.1963 को हुआ। गुरु की विंशोत्तरी दशा 13 वर्ष 2 महीना 26 दिन है। जातक को नौकरी 1994 में शनि महादशा और गुरु की अंतर्दशा में मिली। ऊपर बताये गये नियम कर्क लग्न वाली कुंडली पर लागू नहीं होंगे। गोचर के नियम भी इस पर लागू नहीं होंगे। ये नियम सिर्फ उसी कुंडली पर पूर्णतः लागू हांेगे जिसका लग्न मेष, वृष, मिथुन, सिंह, वृश्चिक या तुला है। कुंडली 3 में लग्न कर्क है। शनि सप्तम और अष्टम का स्वामी होकर सप्तम भाव में बैठा है। गुरु षष्ठ और नवम का स्वामी होकर भाग्य स्थान में बैठा है। षष्ठेश और नवमेश की दशा या अंतर्दशा में नौकरी मिलती है जैसा कि द्वितीय और तृतीय नियमों में उल्लेख किया गया है। परंतु इस कुंडली के साथ अपवाद है। गोचर के दृष्टिकोण से देखें। नौकरी मिलने के समय शनि अष्टम भाव में और गुरु पंचम भाव में बैठा है। राहु भी पंचम भाव में बैठा है। गोचर के प्रथम तथा द्वितीय नियम सत्य साबित हो रहे हंै। उदाहरण 4: जातक का जन्म 13.9.1947 में सिंह लग्न में हुआ। केतु की भोग्य विंशोत्तरी दशा 6 वर्ष 29 दिन है। जातक को नौकरी शुक्र की दशा और मंगल की अंतर्दशा में मिली। शुक्र दशमेश होकर लग्न में बैठा है और मंगल नवमेश है। दशानाथ और अंतर्दशानाथ द्वितीय और षष्ठ नियम को सत्य साबित कर रहे हंै। गोचर के दृष्टिकोण से नौकरी मिलने के समय शनि और गुरु दोनों पंचम भाव में बैठेे हैं। राहु भी गोचर से लग्न में बैठा है। दशम भाव का स्वामी शुक्र लग्न में बैठा है और पंचम में बैठा गुरु उसे देख रहा है। राहु और शनि एक-दूसरे से त्रिकोण में हं। अंतर्दशा स्वामी मंगल एकादश भाव में है जिस पर पंचम में बैठे शनि और गुरु की दृष्टि है। दशमेश शुक्र और गोचर का गुरु एक-दूसरे से त्रिकोण में विराजमान हैं। इस प्रकार गोचर के प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ नियम सत्य साबित हो रहे हंै। उदाहरण 5: जातक का जन्म 18.3.1967 को तुला लग्न में हुआ। जन्म के समय मंगल की विंशोत्तरी दशा 5 वर्ष 11 महीना 15 दिन है। जातक को नौकरी नवंबर, 1999 में मिली। उस समय गुरु की महादशा और शुक्र की अंतर्दशा चल रही थी। तृतीय तथा छठे भाव का स्वामी गुरु वक्री होकर दशम भाव में बैठा है। अष्टम और लग्न का स्वामी होकर शुक्र सप्तम भाव में बैठा है। इससे प्रथम तथा तृतीय नियम सत्य साबित हो रहे हैं। अब गोचर पर ध्यान दें। नवंबर, 1999 में गुरु और शनि दोनों वक्री होकर सप्तम भाव में बैठे हंै। गोचर का राहु दशम भाव में बैठा है। शनि के वक्री होने के कारण गोचर का राहु और शनि एक-दूसरे से त्रिकोण में हैं। वक्री गुरु गोचर से दशम से दशम अर्थात सप्तम भाव में बैठा है। इस प्रकार हम देखते हैं कि गोचर के प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ नियम सत्य साबित हो रहे हं। इन कुंडलियों के अतिरिक्त और भी अनेक कुंडलियों पर उपर्युक्त नियमों को लागू करके देखा गया जो 90 प्रतिशत तक सत्य साबित हुए हैं।

फलित ज्योतिष संबंधी जानकारीयॉं

1. संतान प्राप्ति के लिए पति-पत्नी दोनों को रामेश्वरम् की यात्रा करनी चाहिए तथा वहां सर्प-पूजन करवाना चाहिए। इस कार्य को करने से संतान-दोष समाप्त होता है।

2. स्त्री में कमी के कारण संतान होने में बाधा आ रही हो, तो लाल गाय व बछड़े की सेवा करनी चाहिए। लाल या भूरा कुत्ता पालना भी शुभ रहता है।

3. यदि विवाह के दस या बारह वर्ष बाद भी संतान न हो, तो मदार की जड़ को शुक्रवार को उखाड़ लें। उसे कमर में बांधने से स्त्री अवश्य ही गर्भवती हो जाएगी।

4. जब गर्भ धारण हो गया हो, तो चांदी की एक बांसुरी बनाकर राधा-कृष्ण के मंदिर में पति-पत्नी दोनों गुरुवार के दिन चढ़ायें तो गर्भपात का भय/खतरा नहीं होता।

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5. यदि बार-बार गर्भपात होता है, तो शुक्रवार के दिन एक गोमती चक्र लाल वस्त्र में सिलकर गर्भवती महिला के कमर पर बांध दें। गर्भपात नहीं होगा।

6. जिन स्त्रियों के सिर्फ कन्या ही होती है, उन्हें शुक्र मुक्ता पहना दी जाये, तो एक वर्ष के अंदर ही पुत्र-रत्न की प्राप्ति होगी।

7. यदि बच्चे न होते हों या होते ही मर जाते हों, तो मंगलवार के दिन मिट्टी की हांडी में शहद भरकर श्मशान में दबायें।

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8. पीपल की जटा शुक्रवार को काट कर सुखा लें, सूखने के बाद चूर्ण बना लें। उसको प्रदर रोग वाली स्त्री प्रतिदिन एक चम्मच दही के साथ सेवन करें। सातवें दिन तक मासिक धर्म, श्वेत प्रदर तथा कमर दर्द ठीक हो जाएगा।

9. संतान प्राप्ति के लिए इनमें से किसी भी मंत्र का नियमित रूप से एक माला प्रतिदिन पाठ करें।

1. ओऽम् नमो भगवते जगत्प्रसूतये नमः।

2. ओऽम क्लीं गोपाल वेषघाटाय वासुदेवाय हूं फट् स्वाहा।

3. ओऽम नमः शक्तिरूपाय मम् गृहे पुत्रं कुरू कुरू स्वाहा।

4. ओऽम् हीं श्रीं क्लीं ग्लौं।

5. देवकी सुत गोविन्द वासुदेवाय जगत्पते। देहिं ये तनयं कृबज त्यामहं शरणंगत।

इनमें से आप जिस मंत्र का भी चयन करें उस पर पूर्ण श्रद्धा व आस्था रखें। विश्वासपूर्वक किये गये कार्यों से सफलता शीघ्र मिलती है। मंत्र पाठ नियमित रूप से करें।

कृष्ण के बाल रूप का चित्र लगाएं। लड्डू गोपाल का चित्र या मूर्ति लगाना लाभदायक होता है। क्रम संख्या 4 व 5 पर दिए गये मंत्र शीघ्र फलदायक हैं। इन्हें संतान गोपाल मंत्र भी कहा जाता है।

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संतान रक्षा हेतु मंत्र-तंत्र-यंत्र एवं उपासना
1. यदि पंचम भाव में सूर्य स्थित हो तो:
कभी झूठ मत बोलो और दूसरों के प्रति दुर्भावना मत रखें।
यदि आप किसी को केाई वचन दें तो उसे हर हाल में पूरा करें।
प्राचीन परंपराओं व रस्म रिवाजों की कभी अवहेलना न करें।
दामाद, नाती (नातियों) तथा साले के प्रति कभी विमुख न हों न ही उनके प्रति दुर्भावना रखें।
पक्षी, मुर्गा और शिशुओं के पालन-पोषण का हमेशा ध्यान रखें।
2. यदि पंचम भाव में चंद्र हो तो:
कभी लोभ की भावना मत रखें तथा संग्रह करने की मनोवृत्ति मत रखें।
धर्म का पालन करें, दूसरों की पीड़ा निवारणार्थ प्रयास करते रहें और अपने कुटुंब के प्रति ध्यान रखें।
चंद्र संबंधी कोई भी अनुष्ठान करने से पूर्व कुछ मीठा रखकर, पानी पीकर घर से बाहर जाएं।
सोमवार को श्वेत वस्त्र में चावल-मिश्री बांध कर बहते जल में प्रवाहित करें।
3. यदि पंचम भाव में मंगल बैठा हो तो:
रात में लोटे में जल को सिरहाने रखकर सोएं।
परायी स्त्री से घनिष्ठ संबंध न रखें तथा अपना चरित्र संयमित रखें।
अपने बड़े-बूढ़ों का सम्मान करें और यथासंभव उनकी सेवा करें तथा सुख सुविधा का ध्यान रखें।
अपने मृत बुजुर्गों इत्यादि का पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध करें। यदि आपका सुहृद संतान मर गया हो तो उसका भी श्राद्ध करें।
नीम का वृक्ष रोपंे तथा मंगलवार को थोड़ा सा दूध दान करें।
4. यदि पंचम भाव में बुध हो तो:
गले में तांबे का पैसा धारण करें।
यदि गो-पालन किया जाए तो संतान, स्त्री और भाग्य का पूर्ण सुख प्राप्त होगा।
5. यदि पंचम भाव में बृहस्पति विराजमान हो तो:
सिर पर चोटी रखें और जनेऊ धारण करें।
आपने यदि धर्म के नाम पर धन संग्रह किया या दान लिया तो संतान को निश्चित कष्ट होगा। धर्म का कार्य यदि आप निःस्वार्थ भाव से करेंगे तो संतान काफी सुखी-संपन्न रहेगी।
केतु के भी उपाय निरंतर करते रहें।
मांस, मदिरा तथा परस्त्री गमन से दूर रहें।
संत, महात्मा तथा संन्यासियों की सेवा करें तथा मंदिर की कम से कम महीने में एकबार सफाई अवश्य करें।
6. यदि पंचम भाव में शुक्र स्थित हो तो:
गोमाता तथा श्रीमाता जी की पूर्ण निष्ठा के साथ सेवा करें।
किसी के लिए हृदय मंे दुर्भावना न रखें तथा शत्रुओं के प्रति भी शत्रुता की भावना न रखें।
चांदी के बर्तन में रात में शुद्ध दूध पिया करें।
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7. यदि पंचम भाव में शनि स्थित हो तो:
(क) पैतृक भवन की अंधेरी कोठरी में सूर्य संबंधी वस्तुएं जैसे गुड़-तांबा, मंगल संबंधी वस्तुएं जैसे सौफ, खांड,शहद तथा लाल मूंगे व हथियार, चंद्र संबंधी वस्तुएं जैसे चावल, चांदी तथा दूब स्थापित करें।

अपने भार के दशांश के तुल्य बादाम बहते हुए पानी में डालें और उनके आधे घर में लाकर रखें लेकिन खाएं नहीं।
यदि संतान का जन्म हो तो मिठाई न बांट कर नमकीन बांटें। यदि मिठाई बांटना जरूरी हो, तो अंशमात्र नमक का भी समावेश कर दें।
काला कुत्ता पालें और उसे नित्य एक चुपड़ी रोटी दें।
बुध संबंधी उपाय करते रहें
8. यदि पंचम भाव में राहु उपस्थित हो तो:
अपनी पत्नी के साथ दुबारा फेरे लेने से राहु की अशुभता समाप्त हो जाती है।
एक छोटा सा चांदी का हाथी निर्मित करा कर घर के पूजा स्थल में रखें।
मांस, मदिरा व परस्त्री गमन से दूर रहें।
जातक की पत्नी अपने सिरहाने पांच मूलियां रखकर सोएं और अगले दिन प्रातः उन्हें मंदिर में दान कर दें।
घर के प्रवेश द्वार की दहलीज के नीचे चांदी की एक छोटी सी चादर/पत्तर दबाएं।
9. यदि केतु पंचम भाव में उपस्थित हो तो:
चंद्र व मंगल की वस्तुएं दूध-खांड इत्यादि का दान करें।
बृहस्पति संबंधी सारे उपाय करें।
घर में यदि कोई शनि संबंधी वस्तु (काली वस्तुएं) हो तो उसे ताले में ही रखें।

यदि किसी दंपति की संतान संबंधी कोई समस्या है जैसे गर्भ न ठहरना, गर्भपात हो जाना, मृत बच्चे का जन्म होना, संतान का बीमार रहना, मंदबुद्धि बच्चे का जन्म आदि तो घरेलू उपाय कर स्वस्थ, बुद्धिमान तथा योग्य संतान प्राप्त कर सकते हैं। यहां प्रस्तुत हैं इन्हीं समस्याओं के निदान के अनेकानेक उपाय...

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संतान प्राप्ति की कामना मनु महाराज द्वारा वर्णित तीन नैसर्गिक इच्छाओं में से एक है। निःसंतान रहना एक भयंकर अभिशाप है। यह पूर्व जन्म में किए गए कर्मों के फल है या फल का भोग है। संतान हो किंतु दुष्ट और कुल -कीर्तिनाशक हो तो यह स्थिति और अधिक कष्टदायक होती है। जिनके संतान नहीं होती है भारत में उनकी तीन श्रेणियां मानी जाती हैं।

1. जन्मवंध्या 2. काक वंध्या 3. मृतवत्सा।

काक वंध्या वह होती है जिसके केवल एक संतान होती है।

2. मृतवत्सा के संतान तो होती है पर जीवित नहीं रहती।

3. जन्मवंध्या के संतान होती ही नहीं। यहां तीनों श्रेणियों की स्त्रियों की इस अभिशाप से मुक्ति के कुछ टोटके दिए जा रहे हैं जिनका निष्ठापूर्वक प्रयोग करने से लाभ मिल सकता है।

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जन्मवंध्या: रासना नामक एक जड़ी को रविवार के दिन जड़ डंठल और पत्ते सहित उखाड़ लाएं। इसे 11 वर्ष से कम आयु अर्थात कुमारी कन्या के हाथ से एक रंग की गाय के दूध् में पिसवा कर रख लें। ऋतु काल में मासिक धर्म के दिनों में इसे चार तोले के हिसाब से एक सप्ताह पीने से संतान उत्पन्न होती है। ध्यान रहे यह प्रयोग तीन चार बार दोहराना पड़ सकता है।

एक रुद्राक्ष और एक तोला सुगंध रासना को कुमारी कन्या के हाथ से एक रंग की गाय के दूध में पिसवा कर पीएं। ‘¬ ददन्महागणपते रक्षा-मृत मत्सुत देहि’ इस मंत्र से औषधि को 21 बार अभिमंत्रित कर ले।
काकवंध्या: काक वंध्या वह कहलाती है जिसके एक ही बार संतान हो। यदि ऐसी स्त्रियां संतान की इच्छा रखती हों तो ये प्रयोग करें।

रवि पुष्य योग में दिन को असगंध की जड़ उखाड़ लाएं और भैंस के दूध के साथ पीस कर दो तोला रोज खाएं।
विष्णुकांता की जड़ रविपुष्य के दिन ला कर पूर्वोक्त प्रकार से भैंस के दूध के साथ पीस पर भैंस के ही दूध के मक्खन के साथ सात दिन तक खाने से संतान प्राप्त होती है। यह प्रयोग ऋतुकाल में ही करें।
मृतवत्सा: मृतवत्सा वह होती है जिसके संतान होती तो अवश्य है परंतु जीवित नहीं रहती। इसमें गाय का घी काम में लिया जाना चाहिए। खास कर उसका जिसका बछड़ा जीवित हो।

मजीठ, मुरहठी, कूट, त्रिफला, मिश्री, खरैंटी, महामेदा, ककोली, क्षीर काकोली, असगंध की जड़, अजमोद, हल्दी, दारु हल्दी, हिंगु टुटकी, नीलकमल, कमोद, दाख, सफेद चंदन और लाल चंदन ये सब वस्तुएं चार-चार तोला लेकर कूट-छानकर एक किलो घी में मिलाकर उपलों पर मंदी आंच पर पकानी चाहिए। जब केवल घी की मात्रा के बराबर रह जाए तो छान कर रख लेना चाहिए। इसका प्रयोग पति-पत्नी दोनों करें तो पुत्र उत्पन्न होगा जो स्वस्थ तथा सुंदर होगा। जब तक इन वस्तुओं का सेवन किया जाए तब तक हल्का भोजन करना चाहिए। भगवान के प्रति पूर्ण आस्था रखते हुए दिन में सोने, तामसिक पदार्थों के सेवन, भय, चिंता, क्रोध आदि तथा तेज सर्दी और गर्मी से बचना चाहिए। कुछ और प्रयोग भी हैं जो इस प्रकार हैं।
ऋतु काल में नए नागकेसर के बारीक चूर्ण को गाय के घी के साथ मिला कर खाने से भी संतान प्राप्त होती है।
जटामांसी (एक जड़ी का नाम) को चावल के पानी के साथ पीने से संतान प्राप्त होती है।
मंगलवार को कुम्हार के घर जाएं और कुम्हार से प्रार्थना पूर्वक मिट्टी के बर्तन काटने वाला डोरा ले आएं। उसे किसी गिलास में जल भर कर उसमें डाल दें। कुछ समय पश्चात डोरे को निकाल लें और वह पानी पति-पत्नी दोनों पी लें। यह क्रिया मंगलवार को ही करें। अगर संभव हो तो पति-पत्नी रमण करें। गर्भ की स्थिति बनते ही डोरे को हनुमान जी के चरणों में रख दें। बार-बार गर्भपात होने पर
मुलहठी, आंवला और सतावर को भली भांति पीस कर कपड़ाछान कर लें और इसका सेवन रविवार से प्रारंभ करें। गाय के दूध के साथ लगभग 6 ग्राम प्रतिदिन लें।
मंगलवार को लाल कपड़े में थोड़ा सा नमक बांध लें। इसके बाद हनुमान के मंदिर जाएं और पोटली को हनुमान जी के पैरों से स्पर्श कराएं। वापस आकर पोटली को गर्भिणी के पेट से बांध दें गर्भपात बंद हो जाएगा। पुत्र प्राप्ति हेतु
विजोरे की जड़ को दूध में पका कर घी में मिला कर पीएं। ऋतुकाल में इस प्रयोग को प्रारंभ कर सम संख्या वाले दिनों में समागम करने से पुत्र प्राप्त होता है।
पुत्राभिलाषियों को अपने घर में स्वर्ण अथवा चांदी से निर्मित सूर्य-यंत्र की स्थापना करनी चाहिए। यंत्र के पूर्वाभिमुख बैठकर दीपक जलाकर यं त्रऔर सूर्य देव को प्रणाम करते हुए सूर्य मंत्र का 108 बार नित्य श्रद्धा से जप करना चाहिए। दीपक में चारों ओर बातियां (बत्तियां) होनी चाहिए। घृत का चतुर्मुखी दीपक जप-काल में प्रज्वलित रहना चाहिए।
षष्ठी देवी का एक वर्ष तक पूजन अर्चन करने से पुत्र-संतान की प्राप्ति होती है। ऊँ ह्रीं षष्ठी देव्यै स्वाहा मंत्र का प्रतिदिन 108 बार जप करते हुए षष्ठी देवी चालीसा, षष्ठी देवी स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। कथा भी पढ़नी सुननी चाहिए।
श्रावण शुक्ल एकादशी का पुत्रदा एकादशी व्रत पुत्र सुख देता है। व्रत संपूर्ण विधि से करें।
स्त्रियां पुत्रदायक मंगल व्रत कर सकती हैं जिसे बैशाख या अगहन मास में प्रारंभ करना चाहिए। व्रत वर्ष भर प्रत्येक मंगल को करें और नित्य मंगल की स्तुति करें।
जिसको पुत्र प्राप्त नहीं हो रहा है वह स्त्री रविवार को प्रातः काल उठकर सिर धोकर खुले बाल फैलाकर उगते सूर्य को अघ्र्य दे और उनसे श्रेष्ठ पुत्र प्राप्ति की प्रार्थना करे। इस प्रकार 16 रविवार तक करे तो सफलता निश्चित प्राप्त होती है।
जिस स्त्री को पुत्र नहीं हो रहा हो वह अपने घर में 21 तोले का प्राण प्रतिष्ठित चैतन्य पारद शिवलिंग स्थापित कराए और प्रत्येक सोमवार को सिर धोकर पीठ पर बाल फैलाकर ‘ऊँ नमः शिवायः’ मंत्र से उस पारद शिवलिंग पर धीरे-धीरे जल चढ़ाए और 7 बार उस जल का चरणामृत ले। इस प्रकार 16 सोमवार करे तो पुत्र प्राप्ति के लिए शंकर से की जाने वाली प्रार्थना अवश्य फलित होती है।
पति को चाहिए कि वह पत्नी को कम से कम 4 ( रत्ती का शुद्ध पुखराज स्वर्ण अंगूठी में गुरु पुष्य नक्षत्र में जड़वाकर तथा गुरु मंत्रों से अभिमंत्रित करवाकर शुभ मुहूर्त में पत्नी को धारण करवाए। इससे पुत्र प्राप्ति की संभावना बढ़ती है।
प्राण प्रतिठित संतानगोपाल यंत्र प्राप्त कर उसे एक थाली में पीले पुष्प की पंखुड़ियां डालकर स्थापित करें। यंत्र का पूजन पुष्प, कुंकुंम अक्षत से करें, दीपक लगाकर (यंत्र के दोनों ओर घी के दीपक लगाएं) निम्न मंत्र का पुत्र जीवा माला से एक माला जप नित्य करें। निरंतर 21 दिन तक करें तो सफलता प्राप्त होती है। ।।‘‘ऊँ हरिवंशाय पुत्रान् देहि देहि नमः।।’’ 21 दिन पश्चात यंत्र और माला बहते जल में प्रवाहित करे दें।
रक्त गुणा की जड़ को शुभ योग में प्राप्त कर तांबे की ताबीज में रखकर भुजा या कमर में धारण करने वाली स्त्री को पुत्र की प्राप्ति होती है।
एक बेदाग नीबू का पूरा रस निचोड़ लें। इसमें थोड़ा सा नमक स्वाद के अनुसार मिला लें। अब इस द्रव को लड्डू गोपाल के आगे थोड़ी देर के लिए रख दें। रात को सोने से पूर्व स्त्री इस द्रव को पी ले और पति-पत्नी अपने धर्म का पालन करें तो अवश्य पुत्र ही होगा। ध्यान रहे यह क्रिया केवल एक बार ही करनी है, बार-बार नहीं।
यदि संतान न हो रही हो तो मंगलवार को मिट्टी के बर्तन में शुद्ध शहद भर कर ढक्कन लगा कर श्मशान में गाड़ दें।
उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में नीम की जड़ ला कर पास रखें, संतान अवश्य होगी।
वास्तुशास्त्र के अनुसार घर में बोरिंग के पानी टैंक या कुएं का उत्तर-पश्चिम कोण में होना भी संतान उत्पत्ति में बाधक माना गया है। उपाय के लिए पांचमुखी हनुमान जी का चित्र ऐसे लगाएं कि वह पानी को देखें।
असगंध का भैंस के दूध के साथ सात दिन तक लें। यह उपाय पुष्य नक्षत्र में रविवार को शुरू करें। इससे पुत्र उत्पन्न होता है।
गोखरू, लाल मखाने, शतावर, कौंच के बीज, नाग बला और खरौंटी समान भाग में पीस कर रख लें। इस चूर्ण को रात्रि में पांच ग्राम दूध के साथ लें।
रविवार पुष्य योग के दिन (पुष्य नक्षत्र) सफेद आक की जड़ गले में बांधने से भी गर्भ की रक्षा होती है। इसके लिए धागा लाल ही प्रयोग करें।
‘‘ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रूं पुत्रं कुरु कुरु स्वाहा‘‘- यह जप यंत्र है। वांछित यंत्र स्वर्ण अथवा चांदी के अतिरिक्त स्वर्ण पालिश वाला यंत्र भी समान रूप से लाभकारी होता है। निःसंतान दंपतियों को सूर्य का स्तवन भी करना चाहिए जैसे सूर्याष्टक, सूर्यमंडलाष्टकम् आदि। इन स्तोत्रों का निरंतर श्रद्धा भक्ति पूर्वक पाठ जातक को तु.रंत सुखानुभूति देता है। स्वरुचि के अनुसार सूर्य देवता की अन्य किसी भी स्तुति का पाठ कर सकते हैं। (पति पत्नी दोनों अथवा कोई भी एक)
किसी योग्य ज्योतिष के परामर्शानुसार अथवा कुलगुरु, पुरोहित से सलाह लेकर संतान गोपाल मंत्र का जप स्वयं करें अथवा योग्य, अनुभवी कर्मकांडी ब्राह्मण से विधि विधान के साथ करावें। मंत्रानुष्ठान एक लाख मंत्र जप शास्त्र सम्मत माना गया है। इसमें निश्चित समय, निश्चित स्थान, निश्चित आसन और निश्चित संख्या में प्रतिदिन जप करने का विधान है।


गृह कलह की कोई न को¬ई वजह जरूर होती है जैसे पति-पत्नी के तनाव का मुख्य कारण उनके घरवालों को लेकर उत्पन्न कलह होती है। कलह के कारण कई बार तो दाम्पत्य जीवन में तनाव इतना बढ़ जाता है कि तलाक तक की नौबत आ जाती है। इससे बचाव का एक सरल सा रास्ता यह है कि जब भी आप अपने लड़के या लड़की के गुणों का मिलान कराएं तो गुणों के साथ-साथ पत्री पर भी ध्यान दें। कई बार कलह बच्चों के जन्म को लेकर भी होता है जिसकी वजह से गृह क्लेश काफी बढ़ जाता है।

दाम्पत्य जीवन में कलह के कुछ मुख्य कारण इस प्रकार हैं।

1- लड़के या लड़की की पत्री में सप्तम भाव में शनि का होना या गोचर करना।

2- किसी पाप ग्रह की सप्तम या अष्टम भाव पर दृष्टि होना या राहु, केतु अथवा सूर्य का वहां बैठना

3- पति-पत्नी की एक सी दशा या शनि की साढ़े साती का चलना भी कलह एवं तलाक का एक कारण होता है।

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4- शुक्र की गुरु में दशा का चलना या गुरु में शुक्र की दशा का चलना भी एक कारण है। कलह को दूर करने के कुछ उपायों का वर्णन यहां किया जा रहा है।

5- अगर कलह का कारण शनि ग्रह से संबंधित है तो शनि ग्रह की शांति कर सकते हैं, शनि यंत्र पर जप कर सकते हैं और शनि की वस्तुओं का दान भी कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त सात मुखी रुद्राक्ष भी धारण कर सकते हैं। यह उपाय शनिवार को सायंकाल के समय करना ठीक होता है ।

6- अगर गृह कलह राहु से संबंधित हो तो राहु यंत्र पर राहु के मंत्र का जप करें एवं 8 मुखी रुद्राक्ष धारण करें। यह सभी प्रकार के कलहों व बाधाओं से मुक्त करता है और राहु के दुष्प्रभाव का निवारण करता है। इसके लिए राहु का दान भी कर सकते हैं।

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7- अगर गृह क्लेश का कारण केतु ग्रह हो तो उसकी वस्तुओं का दान एवं उसके मंत्र का जप करें। केतु यंत्र पर पूजा करें। गणेश मंत्र का जप करें। 9 मुखी रुद्राक्ष भी धारण कर सकते हैं।

अगर गृहस्थ जीवन में कलह किसी पराई स्त्री की वजह से हो तो ये उपाय करें।

Aquamarine Gem Stone धारण करें। नीलम और हीरा भी धारण कर सकते हैं। वशीकरण यंत्र पर जप करके भी कलह को समाप्त कर सकते हैं। गौरी शंकर रुद्राक्ष भी धारण कर सकते हैं और शीघ्र प्रभाव के लिए मातंगी यंत्र भी अपने घर में पूजा के स्थान पर स्थापित कर सकते हैं।

- कई बार देखने में आता है कि न तो ग्रहों की परेशानी है, न ही पत्री में दशा एवं गोचर की स्थिति खराब है। फिर भी गृह कलह है जिसके कारण बात तलाक तक पहुंच जाती है। ऐसे में यह धारणा होती है कि किसी ने कुछ जादू टोना अर्थात तांत्रिक प्रयोग तो नहीं किया। अगर ऐसा लगे तो ये उपाय करें:

- घर में पूजा स्थान में बाधामुक्ति यंत्र स्थापित करें।

- शुक्ल पक्ष में सोमवार को उत्तर दिशा में मुख करके पति और पत्नी गौरीशंकर रुद्राक्ष धारण करें।

- पत्नी Aquamarine धारण करंे और पति नीलम और हीरा धारण करें।

- शयन कक्ष में शुक्र यंत्र की स्थापना करें।

विवाह बाधा के उपाय
- बाधा मुक्ति यंत्र की स्थ¬ापना एवं रोज सुबह पूजा करें।

- शनि ग्रह के कारण विवाह में बाधा आ रही हो तो लड़के या लड़की को सातमुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।

- शनि ग्रह की वस्तुएं दान करनी चाहिए।

- शनि यंत्र पर शनिवार से शुरू करके रोज शनि के मंत्र का जप करना चाहिए।

सूर्य के कारण विवाह में बाधा आती हो तो:
- सूर्य यंत्र को अपने घर में स्थापित करके सूर्य मंत्र का जप करें। यह रविवार से शुरू करके रोज करें।

- सूर्य की वस्तुओं का दान करें। तांबे के एक लोटे में गेहूं भरकर रविवार की सुबह 6 से 8 बजे के बीच दान करें।

- रविवार को 1 मुखी रुद्राक्ष धारण करें।

राहु ग्रह के कारण विवाह बाधाः
अगर विवाह में बाधा राहु ग्रह के कारण आ रही हो तो ये उपाय करेंः

- आठमुखी रुद्राक्ष धारण करें।

- राहु यंत्र को अपने पूजा स्थान पर स्थापित करें।

- रविवार को जौ लेकर रविवार के दिन दान करें।

- किसी गरीब को पानमसाला दान करें।

- गुरुद्वारे में या किसी भी धर्मस्थल पर जूते चप्पल की सेवा करें।

अशुभ ग्रहों का उपाय कर लेना अनिवार्य होता है। खास कर पुरुषों को तो केतु के उपाय करने ही चाहिए, क्योंकि विवाह के बाद पुरुष के ग्रहों का संपूर्ण प्रभाव स्त्री पर पड़ता है।

लड़की की शादी में रुकावट आने पर
- गुरुवार को विष्णु-लक्ष्मी जी के मंदिर में जा कर विष्णु जी को कलगी (जो सेहरे के ऊपर लगी होती है) चढ़ाएं। साथ में बेसन के पांच लड्डू चढ़ाएं। शादी जल्दी हो जाएगी।

- किसी भी कारण से, योग्य वर नहीं मिल पा रहा हो, तो कन्या किसी भी गुरुवार को प्रातः नहा-धो कर पीले रंग के वस्त्र पहने। फिर बेसन के लड्डू स्वयं बनाए। लड्डुओं का आकार कुछ भी हो, परंतु उनकी गिनती 108 होनी चाहिए। फिर पीले रंग के प्लास्टिक की टोकरी में, पीले रंग का कपड़ा बिछा कर उन 108 लड्डुओं को उसमें रख दे तथा अपनी श्रद्धानुसार कुछ दक्षिणा रख दे। पास के किसी शिव मंदिर में जा कर, विवाह हेतु गुरु ग्रह की शांति और अनुकूलता के लिए संकल्प करके, सारा सामान किसी ब्राह्मण को दे दे। शिव-पार्वती से प्रार्थना कर अपने घर आ जाए।

सावधानी: बेसन का चूरा, जिससे लड्डू बनाए गए हों, पूरा काम में आ जाए, घर में नहीं रहे और न ही कोई लड्डू घर में काम में लिया जाए। सभी काम अमृत, शुभ के चैघड़िये में, भद्रारहित होने पर करें।

यदि कन्या का विवाह न हो रहा हो और माता-पिता बहुत परेशान हांे, सारे प्रयास विफल हो रहे हांे तो उसे किसी शुभ मुहूर्त में निम्न मंत्रों में से किसी एक का जप करना चाहिए।

कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नंदगोपसुतं देवं पतिं मे कुरु ते नमः।।

ऊँ देवेंद्राणि नमस्तुभ्य देवेंद्रप्रिय भामिनी
विवाह भाग्यमारोग्यं शीघ्रलाभं च देहि मे।।

लड़के की शादी के लिए
गुरुवार को पीले रंग की चुन्नी, पीला गोटा लगा कर, विष्णु-लक्ष्मी जी को चढ़ाएं। साथ में बेसन के पांच लड्डू चढ़ाएं तो शादी में आने वाली रुकावट दूर हो जाएगी।

ग्रहों के उपाय निम्नलिखित हैं
सूर्य के लिए गेहूं और तांबे का बर्तन दान करें।
चंद्र के लिए चावल, दूध एवं चांदी की वस्तु का दान करें।
मंगल के लिए साबुत मसूर या मसूर की दाल दान करें।
बुध के लिए साबुत मूंग का दान करें।
गुरु के लिए चने की दाल एवं सोने की वस्तु दान करें।
शुक्र के लिए दही, घी, कपूर और मोती में से किसी एक वस्तु का दान करें।
शनि के लिए काले साबुत उड़द एवं लोहे की वस्तु का दान करें।
राहु के लिए सरसों एवं नीलम का दान करें।
केतु के लिए तिल का दान करें।
किसी भी स्त्री या पुरुष के विवाह में बाधा आ रही हो, या वैवाहिक जीवन में तनाव हो, तो गणेश जी के मंदिर में हार-फूल चढ़ाए और हल्दी का तिलक लगाए।
ऊँ गणेशाय नमः का मंत्र बोलते हुए गणेश जी पर 108 फूल एक-एक करके चढ़ाए तथा आरती करे। ऐसा 40 दिन तक नियमित करे। गुरुवार का उपवास करे। गुरुवार व्रत कथा गुरुवार को करे। प्रति गुरुवार को हल्दी की गांठ बिस्तर के नीचे ले कर सोए। लड़का या लड़की देखते समय हल्दी का टीका खुद लगाए। गणेश जी को गुड़ का भोग लगाए उसके बाद ही सामने जाए। मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होंगी।
मंगल दोष या किसी अन्य कारण से विवाह में विलंब होने पर:
यदि किसी व्यक्ति के विवाह में अत्यधिक विलंब हो रहा हो तथा प्रयत्न करने पर भी बात नहीं बन पा रही हो, तो निम्न प्रयोग करे। सबसे पहले किसी ऐसे पेड़ का पता करे, जिस पर पर्याप्त मात्रा में चींटियों (मकड़ों) का राज्य हो। फिर मंगलवार को एक थाली में आटा, बूरा (देशी खांड) और देशी घी मिला कर मिश्रण तैयार करे तथा एक गोले को नुकीले सिरे से इस प्रकार काटे कि एक गोल ढक्कन जैसा हिस्सा बाहर आ जाए। आटे-बूरे-घी के मिश्रण को छेद द्वारा गोले में भर ले। जब गोला ऊपर तक भर जाए, तो उस पर ढक्कन लगा दे तथा गोले को पोलिथिन के थैले में रख ले। यदि कुछ मिश्रण बच गया हो, तो उसे भी गोले के साथ थैले में डाल ले। रात को सोते समय इस थैले को सिर की तरफ रख कर सो जाए तथा बुधवार की सुबह उठ कर इसे लेकर चींटियों वाले पेड़ के पास जाए। गोले को निकाल कर पेड़ की किसी शाखा, या खोल में रख दे तथा मिश्रण को गोले के ऊपर डाल दे। थैले को कहीं भी फेंक दे। वापस बिना मुड़े अपने घर आ जाए। विवाह संबंधी स्थिति में सुधार होगा। आवश्यक हो, तो इस प्रयोग को 2-3 बार किया जा सकता है।

सावधानी: बुधवार को उठने के बाद प्रयोग कर के वापस घर आने तक मौन रहना जरूरी है।

कुंडली में विवाह प्रतिबंधक योग, विष कन्या योग आदि हों, तो प्रयोग के साथ वाणेशी मंत्र का जप करें, या कराएं। किसी भी ज्योतिषी से विवाह प्रति¬बंधक व विष कन्या योगों की जानकारी ली जा सकती है।

ससुराल में सुखी रहने के लिएः
साबुत हल्दी की 7 गांठें, पीतल । का एक टुकड़ा, थोड़ा सा गुड़ अगर कन्या अपने हाथ से ससुराल की तरफ फेंक दे, तो वह ससुराल में सुरक्षित और सुखी रहेगी।

सास-बहू के बीच क्लेश दूर करने का सरल उपाय:
यदि परिवार में सास-बहू के मध्य हमेशा झगड़ा होता रहता हो जिसके कारण परिवार में कलह की स्थिति बनी रहती हो तो निम्न मंत्र का 21 दिनों तक प्रति दिन 11 माला जप करने से कलह से मुक्ति मिलती है।

मंत्र: ऊँ शांति

वैवाहिक सुख के लिए: कन्या का जब विवाह हो चुका हो और वह विदा हो रही हो, तो एक लोटे में हल्दी और एक पीला सिक्का डाल कर, लड़की के सिर के ऊपर से 7 बार घुमा कर, उसके आगे फेंक दें। वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा।

वर-वधू में प्यार के लिए:
साबुत काले माह में हरी मेहंदी मिला कर, जिस दिशा में वर-वधू का घर हो, उस तरफ फेंकें, तो वर-वधू में प्यार बढ़ेगा और क्लेश समाप्त होगा। यह क्रिया शादी के समय भी कर सकते हैं।

पति की अप्रसन्नता को दूर करने का उपाय:
यदि पति हमेशा अप्रसन्न रहता हो, पत्नी की बातों पर ध्यान न देता हो, हमेशा खोया-खोया सा रहता हो जिसके कारण वैवाहिक जीवन में कलह उत्पन्न हो रही हो तथा सारे प्रयत्न निष्फल हो रहे हांे तो पत्नी पति की अनुकूलता के लिए श्रद्धा विश्वास पूर्वक भगवान शंकर एवं माता पार्वती का ध्यान करके सोमवार से निम्न मंत्र का एक माला जप करे।

मंत्र: ऊँ क्लीं त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीय मामृतात् क्ली ऊँ

यदि पति-पत्नी के बीच छोटी-छोटी बातों को लेकर हमेशा झगड़ा होता रहता हो तथा इस कारण से पारिवारिक कलह बनी रहती हो तो निम्न उपाय करने से लाभ होगा।

शुद्ध स्फटिक से बने शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा करवाकर अपने घर में स्थापित करें। 41 दिन तक नित्य शिवलिंग पर गंगा जल एवं बेल पत्र चढ़ाएं। उसके पश्चात् निम्न मंत्र का नित्य 5 माला जप करें।

ऊँ नमः शिवशक्तिस्वरूपाय मम गृहे शांति कुरु कुरु स्वाहा।

पति-पत्नी के बीच लड़ाई- झगड़ा हो तो रात को सोते समय पति अपने सिरहाने सिंदूर तथा पत्नी कपूर रखे। सुबह उठ कर पत्नी कपूर को जला दे तथा पति सिंदूर को घर में कहीं भी गिरा दे, तो घर में लड़ाई-झगड़े खत्म हो जाएंगे तथा सुख-शांति बनी रहेगी।

परिवार में सुख के लिए:
परिवार में सुख-शांति तथा समृद्धि के लिए प्रति दिन प्रथम रोटी के चार बराबर भाग करें। एक गाय को, दूसरा काले कुत्ते को, तीसरा कौए को दें तथा चैथा भाग चैराहे पर रखें।

हर प्रकार की सुख-शांति के लिए:
अशोक वृक्ष के सात पत्ते मंदिर में रख कर पूजा करें। जब वे मुरझाने लगें, तो नए पत्ते रख दें और पुराने को पीपल के नीचे रख आएं। इससे घर में सुख-शांति बनी रहेगी।

गृह शांति के लिए:
एक पतंग पर अपने कष्ट तथा परेशानियां लिखें। उसे हवा में उड़ा कर छोड़ दें। ऐसा 7 दिन लगातार करें। सभी कष्ट तथा परेशानियां दूर हो जाएंगी तथा घर में सुख-शांति आएगी।

घर में अशांति रहने पर:
यदि आपके लाख उपाय करने पर भी अकारण ही अशांति बनी रहती हो, तो गाय के गोबर का एक छोटा दीपक बनाएं। उसमें तेल और रूई की बत्ती डाल कर थोड़ा गुड़ डाल दें तथा उस दीपक को जला कर दरवाजे के बीच रख दें। परेशानियां कम होने लगेंगी। इसे आवश्यकतानुसार 2-3 बार, थोड़े समय के अंतराल से, कर लेना चाहिए। इसके लिए शनिवार विशेष उपयुक्त दिन है तथा तिल का तेल श्रेष्ठ है।

घरेलू झगड़ा होने पर:
घर में प्रायः क्लेश रहता हो, या छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा होना हो तो घर में गेहूं केवल सोमवार या शनिवार को ही पिसवाएं। पिसवाने से पहले उसमें 100 ग्राम काले चने डाल दें। इस प्रकार का आटा खाने से धीरे-धीरे लड़ाई-झगड़े तथा घर में क्लेश खत्म हो जाएंगे।

मानसिक शांति एवं कार्य की सफलता हेतु:
कुंडली में चंद्रमा पाप पीड़ित या अशुभ होने पर पारिवा¬रिक अशांति, धन की कमी तथा कार्य संचालन में परेशानी देता है। इससे बचाव के लिए रविवार की रात को सोते समय, चांदी या स्टील के गिलास में थोड़ा कच्चा दूध डाल कर उसे सिरहाने रख कर सो जाएं। सोमवार की सुबह इस दूध को कीकर (बबूल) के पेड़ पर चढ़ा आएं।

सावधानी: गिलास को किसी बर्तन से न ढकें।

बाहरी बाधा के कारण परेशानी रहने पर: यदि बाहरी बाधा के कारण घर अथवा व्यवसाय में परेशानी महसूस होती हो, तो अपने निवास/व्यवसाय स्थान के पास जो भी वृक्ष हो, उसकी जड़ में शाम को दूध डालकर वहां अगरबत्ती जलाने से लाभ होता है। इसके लिए सामवार उपयुक्त दिन है।

सर्व आपदा दुख निवारण हेतु:
किसी प्रकार की विपत्ति आने का भय हो अथवा आपदाग्रस्त हो, मनोबल कमजोर हो गया हो, जीवन में बार-बार अशुभ घटनाओं के कारण मन दुखी रहता हो तो श्रद्धा विश्वासपूर्वक निम्न मंत्र का मानसिक जप अथवा लाल चंदन की माला से पांच माला नित्य जप करने से शीघ्र लाभ होता है।

करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राणिभिहन्तु चापदः।

आर्थिक परेशानी निवारण का अचूक उपाय:
यदि आर्थिक समस्या के कारण परिवार में कलह रहती हो, आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई हो कि कुछ भी उपाय न सूझ रहा हो तो कनकधारा यंत्र को अपने घर में अथवा व्यवसाय स्थल पर षोड्शोपचार विधि से पूजन एवं प्राण प्रतिष्ठत करके स्थापित करें। 21 दिन तक नित्य यंत्र के सम्मुख बैठकर श्रद्धा विश्वासपूर्वक कनकधारा स्तोत्र के 11 पाठ करें।

मां लक्ष्मी की कृपा से आर्थिक परेशानी से छुटकारा अवश्य मिलेगा।

मुकदमा, कोर्ट-कचहरी के मामलों के निवारण हेतु उपाय:
यदि कोर्ट-कचहरी संबंधी मामलों के कारण जीवन में संघर्ष तथा तनाव बना रहता हो, कार्य में मन न लगता हो, शत्रुओं के झूठे षड्यंत्र के कारण विपत्ति में फंसे हांे तो भौतिक प्रयासों के साथ-साथ आध्यात्मिक उपाय करने से आई हुई विपत्ति टल जाती है जिससे जीवन में पुनः सुख शांति लौटती है।

शुक्ल पक्ष में किसी शुभ मुहूर्त या मंगलवार को तांबे या सोने से बने बगलामुखी यंत्र को पूर्ण विधि विधान के अनुसार प्राण प्रतिष्ठा करके घर में स्थापित करें। उसके बाद बगलामुखी मंत्र का 36 हजार की संख्या में जप और उसका दशांश हवन करें। साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। जप के लिए हल्दी की माला, पीले वस्त्र, पीला आसन तथा एक समय का भोजन भी पीले रंग का होना चाहिए। इस प्रकार की विधि से पवित्र अवस्था में जप करने से मां बगलामुखी की कृपादृष्टि शीघ्र प्राप्त होती है। साधना काल में त्रुटि होने पर इसका उलटा प्रभाव भी हो सकता है। इसलिए इस साधना को किसी अनुभवी, सिद्ध गुरु के सान्निध्य में संपन्न करें या किसी सुयोग्य कर्मकांडी ब्राह्मण से अनुष्ठान करा सकते हैं।

ऊँ जीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां मुंखं पदं स्तम्भय जिनां कीलय बुद्धिं नाशय जीं ऊँ स्वाहा।

भय नाश के लिए:
मन में हमेशा भय बना रहता हो, हर समय अनिष्ट की आशंका रहती हो, दब्बूपन की आदत बन गई हो, धैर्य एवं साहस में कमी हो जिसके कारण मनोबल कमजोर पड़ गया हो, हमेशा मानसिक परेशानी रहती हो तो भगवती दुर्गा का यंत्र पूजा व प्राण प्रतिष्ठा करके अपने घर में स्थापित कर और यंत्र के सम्मुख बैठ कर नित्य निम्न मंत्र का जप करें।

सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति-समन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते।।


संसार में प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी ग्रह से पीड़ित है। हर व्यक्ति धन-धान्य संपन्न भी नहीं है। ग्रह-पीड़ा के निवारण के लिए निर्धन एवं मध्यम वर्ग का व्यक्ति दुविधा में पड़ जाता है। यह वर्ग न तो लंबे-चौड़े यज्ञ, हवन या अनुष्ठान करवा सकता है, न ही हीरा, पन्ना, पुखराज जैसे महंगे रत्न धारण कर सकता है। ज्योतिष विद्या देव विद्या है। यदि ज्योतिषियों के पास जाएं तो वे प्रायः पुरातन ग्रंथों में से लिए गए उपाय एवं रत्न धारण करने की सलाह दे देते हैं। परंतु आजकल लोग अनुभव सिद्ध एवं व्यवहारिक उपाय चाहते हैं ताकि आम व्यक्ति, जन सामान्य एवं पीड़ित व्यक्ति लाभ उठा सकें।

ग्रहों की शांति के लिए सरल एवं अचूक उपाय प्रस्तुत हैं- जिसमें लाल किताब के अनुसार व ऋषि पाराशर प्रणीत ज्योतिष शास्त्र के अनुसार उपाय बताए गए हैं।

पाराशर एस्ट्रोलॉजी के अनुसार :
1. सूर्य ग्रहों का राजा है। इसलिए देवाधिदेव भगवान् विष्णु की अराधना से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं। सूर्य को जल देना, गायत्री मंत्र का जप करना, रविवार का व्रत करना तथा रविवार को केवल मीठा भोजन करने से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं। सूर्य का रत्न 'माणिक्य' धारण करना चाहिए परंतु यदि क्षमता न हो तो तांबे की अंगूठी में सूर्य देव का चिह्न बनवाकर दाहिने हाथ की अनामिका में धारण करें (रविवार के दिन) तथा साथ ही सूर्य के मंत्र का 108 बार जप करें।

ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः

2. ग्रहों में चंद्रमा को स्त्री स्वरूप माना है। भगवान शिव ने चंद्रमा को मस्तक पर धारण किया है। चंद्रमा के देवता भगवान शिव हैं। सोमवार के दिन शिवलिंग पर जल चढ़ाएं व शिव चालीसा का पाठ करें। 16 सोमवार का व्रत करें तो चंद्रमा ग्रह द्वारा प्रदत्त कष्ट दूर होते हैं। रत्नों में मोती चांदी की अंगूठी में धारण कर सकते हैं। चंद्रमा के दान में दूध, चीनी, चावल, सफेद पुष्प, दही (सफेद वस्तुओं) का दान दिया जाता है तथा मंत्र जप भी कर सकते हैं।

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ऊँ सों सोमाय नमः

3. जन्मकुंडली में मंगल यदि अशुभ हो तो मंगलवार का व्रत करें, हनुमान चालीसा, सुंदरकांड का पाठ करें। मूंगा रत्न धारण करें या तांबे की अंगूठी बनवाकर उसमें हनुमान जी का चित्र अंकितकर मंगलवार को धारण कर सकते हैं। स्त्रियों को हनुमान जी की पूजा करना वर्जित बताया गया है। मंगल के दान में गुड़, तांबा, लाल चंदन, लाल फूल, फल एवं लाल वस्त्र का दान दें।

ऊँ अं अंगारकाय नमः

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4. ग्रहों में बुध युवराज है। बुध यदि अशुभ स्थिति में हो तो हरा वस्त्र न पहनें तथा भूलकर भी तोता न पालें। अन्यथा स्वास्थ्य खराब रह सकता है। बुध संबंधी दान में हरी मूंग, हरे फल, हरी सब्जी, हरा कपड़ा दान-दक्षिणा सहित दें व बीज मंत्र का जप करें।

ऊँ बुं बुधाय नमः

5. गुरु : गुरु का अर्थ ही महान है- सर्वाधिक अनुशासन, ईमानदार एवं कर्त्तव्यनिष्ठ। गुरु तो देव गुरु हैं। जिस जातक का गुरु निर्बल, वक्री, अस्त या पापी ग्रहों के साथ हो तो वह ब्रह्माजी की पूजा करें। केले के वृक्ष की पूजा एवं पीपल की पूजा करें। पीली वस्तुओं (बूंदी के लडडू, पीले वस्त्र, हल्दी, चने की दाल, पीले फल) आदि का दान दें। रत्नों में पुखराज सोने की अंगूठी में धारण कर सकते हैं व बृहस्पति के मंत्र का जप करते रहें।

ऊँ बृं बृहस्पतये नमः

6. शुक्र असुरों का गुरु, भोग-विलास, गृहस्थ एवं सुख का स्वामी है। शुक्र स्त्री जातक है तथा जन समाज का प्रतिनिधित्व करता है। जिन जातकों का शुक्र पीड़ित करता हो, उन्हें गाय को चारा, ज्वार खिलाना चाहिए एवं समाज सेवा करनी चाहिए। रत्नों में हीरा धारण करना चाहिए या बीज मंत्र का जप करें।

ऊँ शुं शुक्राय नमः

7. सूर्य पुत्र शनि, ग्रहों में न्यायाधीश है तथा न्याय सदैव कठोर ही होता है जिससे लोग शनि से भयभीत रहते हैं। शनि चाहे तो राजा को रंक तथा रंक को राजा बना देता है। शनि पीड़ा निवृत्ति हेतु महामृत्युंजय का जप, शिव आराधना करनी चाहिए। शनि के क्रोध से बचने के लिए काले उड़द, काले तिल, तेल एवं काले वस्त्र का दान दें। शनि के रत्न (नीलम) को धारण कर सकते हैं।

ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः

8. राहु की राक्षसी प्रवृत्ति है। इसे ड्रेगन्स हैड भी कहते हैं। राहु के दान में कंबल, लोहा, काले फूल, नारियल, कोयला एवं खोटे सिक्के आते हैं। नारियल को बहते जल में बहा देने से राहु शांत हो जाता है। राहु की महादशा या अंतर्दशा में राहु के मंत्र का जप करते रहें। गोमेद रत्न धारण करें।

ऊँ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः।

9. केतु राक्षसी मनोवृत्ति वाले राहु का निम्न भाग है। राहु शनि के साथ समानता रखता है एवं केतु मंगल के साथ। इसके आराध्य देव गणपति जी हैं। केतु के उपाय के लिए काले कुत्ते को शनिवार के दिन खाना खिलाना चाहिए। किसी मंदिर या धार्मिक स्थान में कंबल दान दें। रत्नों में लहसुनिया धारण करें।

ऊँ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं सः केतवे नमः

दान मुहूर्त
1. सूर्य का दान : ज्ञानी पंडित को रविवार दोपहर के समय।

2. चंद्र का दान : सोमवार के दिन, पूर्णमासी या एकादशी को नवयौवना स्त्री को देना चाहिए।

3. मंगल का दान : क्षत्रिय नवयुवक को दोपहर के समय।

4. बुध का दान : किसी कन्या को बुधवार शाम के समय।

5. गुरु का दान : ब्राह्मण, ज्योतिषी को प्रातः काल।

6. शुक्र का दान : सायंकाल के समय नवयुवती को।

7. शनि का दान : शनिवार को गरीब, अपाहिज को शाम के समय।

8. राहु का दान : कोढ़ी को शाम के समय।

9. केतु का दान : साधु को देना चाहिए।

नवग्रह शांति के अनुभवसिद्ध सरल उपाय : सूर्य ग्रह को प्रसन्न करने के लिए रविवार को प्रातः सूर्य को अर्घ्य दें तथा जल में लाल चंदन घिसा हुआ, गुड़ एवं सफेद पुष्प भी डाल लें तथा साथ ही सूर्य मंत्र का जप करते हुए 7 बार परिक्रमा भी कर लें।

चंद्र ग्रह के लिए हमेशा बुजुर्ग औरतों का सम्मान करें व उनके पैर छूकर आशीर्वाद लें। चंद्रमा पानी का कारक है। इसलिए कुएं, तालाब, नदी में या उसके आसपास गंदगी को न फैलाएं। सोमवार के दिन चावल व दूध का दान करते रहें।

मंगल के लिए हनुमान जी को लाल चोला चढ़ाएं, मंगलवार के दिन सिंदूर एवं चमेली का तेल हनुमान जी को अर्पण करें। इससे हनुमान जी प्रसन्न होते हैं। यह प्रयोग केवल पुरुष ही करें।

बुध ग्रह के लिए तांबे का एक सिक्का लेकर उसमें छेद करके बहते पानी में बहा दें। बुध को अपने अनुकूल करने के लिए बहन, बेटी व बुआ को इज्जत दें व उनका आशीर्वाद लेते रहें। शुभ कार्य (मकान मुर्हूत) (शादी-विवाह) के समय बहन व बेटी को कुछ न कुछ अवश्य दें व उनका आशीर्वाद लें। कभी-कभी (नपुंसक) का आशीर्वाद भी लेना चाहिए।

बृहस्पति ग्रह के लिए बड़ों का दोनों पांव छूकर आशीर्वाद लें। पीपल के वृक्ष के पास कभी गंदगी न फैलाएं व जब भी कभी किसी मंदिर, धर्म स्थान के सामने से गुजरें तो सिर झुकाकर, हाथ जोड़कर जाएं। बृहस्पति के बीज मंत्र का जप करते रहें।

शुक्र ग्रह यदि अच्छा नहीं है तो पत्नी व पति को आपसी सहमति से ही कार्य करना चाहिए। व जब घर बनाएं तो वहां कच्ची जमीन अवश्य रखें तथा पौधे लगाकर रखें। कच्ची जगह शुक्र का प्रतीक है। जिस घर में कच्ची जगह नहीं होती वहां घर में स्त्रियां खुश नहीं रह सकतीं। यदि कच्ची जगह न हो तो घर में गमले अवश्य रखें जिसमें फूलों वाले पौधे हों या हरे पौधे हों। दूध वाले पौधे या कांटेदार पौधे घर में न रखें। इससे घर की महिलाओं को सेहत संबंधी परेशानी हो सकती है।

शनि ग्रह से पीड़ित व्यक्ति को लंगड़े व्यक्ति की सेवा करनी चाहिए। चूंकि शनि देव लंगड़े हैं तो लंगड़े, अपाहिज भिखारी को खाना खिलाने से वे अति प्रसन्न होते हैं।

राहु ग्रह से पीड़ित को कौड़ियां दान करें। रात को सिरहाने कुछ मूलियां रखकर सुबह उनका दान कर दें। कभी-कभी सफाई कर्मचारी को भी चाय के लिए पैसे देते रहें। केतु ग्रह की शांति के लिए गणेश चतुर्थी की पूजा करनी चाहिए। कुत्ता पालना या कुत्ते की सेवा करनी चाहिए (रोटी खिलाना)।

केतु ग्रह के लिए काले-सफेद कंबल का दान करना भी फायदेमंद है। केतु-ग्रह के लिए पत्नी के भाई (साले), बेटी के पुत्र (दोहते) व बेटी के पति (दामाद) की सेवा अवश्य करें। यहां सेवा का मतलब है जब भी ये घर आएं तो इन्हें इज्जत दें।


यदि बुध भाग्येश होकर अच्छा फल देने में असमर्थ हो तो निम्न उपाय करने चाहिए।

1. तांबे का कड़ा हाथ में धारण करें।

2. गणेश जी की उपासना करें।

3. गाय को हरा चारा खिलाएं।

यदि शुक्र भाग्येश होकर फलदायक न हो तो निम्न उपाय करने चाहिए।

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1. स्फटिक की माला से क्क शुं शुक्राय नमः की एक माला का जप करें।

2. शुक्रवार को चावल का दान करें।

3. लक्ष्मी जी की उपासना करें।

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भाग्येश चंद्र को अनुकूल करने के लिए निम्नलिखित उपाय करें।

1.ऊँ श्रां: श्रीं: श्रौं: सः चंद्रमसे नमः का जप करें।

2. चांदी के गिलास में जल पिएं।

3. शिव जी की उपासना करें।

यदि गुरु के कारण भाग्य साथ न दे रहा हो तो निम्नलिखित उपाय करें।

1. विष्णु जी की आराधना करें।

2. गाय को आलू में हल्दी लगा कर खिलाएं।

3. गुरुवार को पीली वस्तुओं का दान करें।

भाग्येश शनि को मजबूत करने के लिए निम्न उपाय करें।

1. काले वस्त्रों तथा नीले वस्त्रों को यथा संभव न पहनें।

2. शनिवार को पीपल के वृक्ष के नीचे दिया जलाएं।

3. शनिवार को हनुमान चालीसा का पाठ करें।

भाग्येश मंगल को अनुकूल करने के लिए निम्न उपाय करें।

1. मजदूरों को मंगलवार को मिठाई खिलाएं।

2. लाल मसूर का दान करें।

3. मंगलवार को सुंदर कांड का पाठ करें।

भाग्येश सूर्य को प्रबल करने के लिए निम्न उपाय करें।

1. गायत्री मंत्र का जप करें।

2. सूर्य को नियमित जल दें।

3. ''ऊँ खोल्काय नमः'' मंत्र का जप करें।


माता-पिता अपनी कन्या का विवाह करने के लिए वर की कुंडली का गुण मिलान करते हैं। कन्या के भविष्य के प्रति चिंतित माता-पिता का यह कदम उचित है। किंतु, इसके पूर्व उन्हें यह देखना चाहिए कि लड़की का विवाह किस उम्र में, किस दिशा में तथा कैसे घर में होगा? उसका पति किस वर्ण का, किस सामाजिक स्तर का तथा कितने भाई-बहनों वाला होगा? लड़की की जन्म लग्न कुंडली से उसके होने वाले पति एवं ससुराल के विषय में सब कुछ स्पष्टतः पता चल सकता है। ज्योतिष विज्ञान में फलित शास्त्र के अनुसार लड़की की जन्म लग्न कुंडली में लग्न से सप्तम भाव उसके जीवन, पति, दाम्पत्य जीवन तथा वैवाहिक संबंधों का भाव है। इस भाव से उसके होने वाले पति का कद, रंग, रूप, चरित्र, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, व्यवसाय या कार्यक्षेत्र, परिवार से संबंध कि आदि की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। यहां सप्तम भाव के आधार पर कन्या के विवाह से संबंधित विभिन्न तथ्यों का विश्लेषण प्रस्तुत है।

ससुराल की दूरी:
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सप्तम भाव में अगर वृष, सिंह, वृश्चिक या कुंभ राशि स्थित हो, तो लड़की की शादी उसके जन्म स्थान से 90 किलोमीटर के अंदर ही होगी। यदि सप्तम भाव में चंद्र, शुक्र तथा गुरु हों, तो लड़की की शादी जन्म स्थान के समीप होगी। यदि सप्तम भाव में चर राशि मेष, कर्क, तुला या मकर हो, तो विवाह उसके जन्म स्थान से 200 किलोमीटर के अंदर होगा। अगर सप्तम भाव में द्विस्वभाव राशि मिथुन, कन्या, धनु या मीन राशि स्थित हो, तो विवाह जन्म स्थान से 80 से 100 किलोमीटर की दूरी पर होगा। यदि सप्तमेश सप्तम भाव से द्वादश भाव के मध्य हो, तो विवाह विदेश में होगा या लड़का शादी करके लड़की को अपने साथ लेकर विदेश चला जाएगा।

शादी की आयु:
यदि जातक या जातका की जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में सप्तमेश बुध हो और वह पाप ग्रह से प्रभावित न हो, तो शादी 13 से 18 वर्ष की आयु सीमा में होता है। सप्तम भाव में सप्तमेश मंगल पापी ग्रह से प्रभावित हो, तो शादी 18 वर्ष के अंदर होगी। शुक्र ग्रह युवा अवस्था का द्योतक है। सप्तमेश शुक्र पापी ग्रह से प्रभावित हो, तो 25 वर्ष की आयु में विवाह होगा। चंद्रमा सप्तमेश होकर पापी ग्रह से प्रभावित हो, तो विवाह 22 वर्ष की आयु में होगा। बृहस्पति सप्तम भाव में सप्तमेश होकर पापी ग्रहों से प्रभावित न हो, तो शादी 27-28 वें वर्ष में होगी। सप्तम भाव को सभी ग्रह पूर्ण दृष्टि से देखते हैं तथा सप्तम भाव में शुभ ग्रह से युक्त हो कर चर राशि हो, तो जातिका का विवाह दी गई आयु में संपन्न हो जाता है। यदि किसी लड़की या लड़के की जन्मकुंडली में बुध स्वराशि मिथुन या कन्या का होकर सप्तम भाव में बैठा हो, तो विवाह बाल्यावस्था में होगा।

विवाह वर्ष ज्ञात करने की ज्योतिषीय विधि:
आयु के जिस वर्ष में गोचरस्थ गुरु लग्न, तृतीय, पंचम, नवम या एकादश भाव में आता है, उस वर्ष शादी होना निश्चित समझना चाहिए। परंतु शनि की दृष्टि सप्तम भाव या लग्न पर नहीं होनी चाहिए। अनुभव में देखा गया है कि लग्न या सप्तम में बृहस्पति की स्थिति होने पर उस वर्ष शादी हुई है।

विवाह कब होगा यह जानने की दो विधियां यहां प्रस्तुत हैं। जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में स्थित राशि अंक में 10 जोड़ दें। योगफल विवाह का वर्ष होगा। सप्तम भाव पर जितने पापी ग्रहों की दृष्टि हो, उनमें प्रत्येक की दृष्टि के लिए 4-4 वर्ष जोड़ योगफल विवाह का वर्ष होगा।

जहां तक विवाह की दिशा का प्रश्न है, ज्योतिष के अनुसार गणित करके इसकी जानकारी प्राप्त की जा सकती है। जन्मांग में सप्तम भाव में स्थित राशि के आधार पर शादी की दिशा ज्ञात की जाती है। उक्त भाव में मेष, सिंह या धनु राशि एवं सूर्य और शुक्र ग्रह होने पर पूर्व दिशा, वृष, कन्या या मकर राशि और चंद्र, शनि ग्रह होने पर दक्षिण दिशा, मिथुन, तुला या कुंभ राशि और मंगल, राहु, केतु ग्रह होने पर पश्चिम दिशा, कर्क, वृश्चिक, मीन या राशि और बुध और गुरु ग्रह होने पर उत्तर दिशा की तरफ शादी होगी। अगर जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में कोई ग्रह न हो और उस भाव पर अन्य ग्रह की दृष्टि न हो, तो बलवान ग्रह की स्थिति राशि में शादी की दिशा समझनी चाहिए। एक अन्य नियम के अनुसार शुक्र जन्म लग्न कंुडली में जहां कहीं भी हो, वहां से सप्तम भाव तक गिनें। उस सप्तम भाव की राशि स्वामी की दिशा में शादी होनी चाहिए। जैसे अगर किसी कुंडली में शुक्र नवम भाव में स्थित है, तो उस नवम भाव से सप्तम भाव तक गिनें तो वहां से सप्तम भाव वृश्चिक राशि हुई। इस राशि का स्वामी मंगल हुआ। मंगल ग्रह की दिशा दक्षिण है। अतः शादी दक्षिण दिशा में करनी चाहिए।

पति कैसा मिलेगा:
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ज्योतिष विज्ञान में सप्तमेश अगर शुभ ग्रह (चंद्रमा, बुध, गुरु या शुक्र) हो या सप्तम भाव में स्थित हो या सप्तम भाव को देख रहा हो, तो लड़की का पति सम आयु या दो-चार वर्ष के अंतर का, गौरांग और सुंदर होना चाहिए। अगर सप्तम भाव पर या सप्तम भाव में पापी ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु या केतु का प्रभाव हो, तो बड़ी आयु वाला अर्थात लड़की की उम्र से 5 वर्ष बड़ी आयु का होगा। सूर्य का प्रभाव हो, तो गौरांग, आकर्षक चेहरे वाला, मंगल का प्रभाव हो, तो लाल चेहरे वाला होगा। शनि अगर अपनी राशि का उच्च न हो, तो वर काला या कुरूप तथा लड़की की उम्र से काफी बड़ी आयु वाला होगा। अगर शनि उच्च राशि का हो, तो, पतले शरीर वाला गोरा तथा उम्र में लड़की से 12 वर्ष बड़ा होगा।

सप्तमेश अगर सूर्य हो, तो पति गोल मुख तथा तेज ललाट वाला, आकर्षक, गोरा सुंदर, यशस्वी एवं राजकर्मचारी होगा। चंद्रमा अगर सप्तमेश हो, तो पति शांत चित्त वाला गौर वर्ण का, मध्यम कद तथा, सुडौल शरीर वाला होगा। मंगल सप्तमेश हो, तो पति का शरीर बलवान होगा। वह क्रोधी स्वभाव वाला, नियम का पालन करने वाला, सत्यवादी, छोटे कद वाला, शूरवीर, विद्वान तथा भ्रातृ-प्रेमी होगा तथा सेना, पुलिस या सरकारी सेवा में कार्यरत होगा।

पति कितने भाई-बहनों वाला होगा:
लड़की की जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव से तृतीय भाव अर्थात नवम भाव उसके पति के भाई-बहन का स्थान होता है। उक्त भाव में स्थित ग्रह तथा उस पर दृष्टि डालने वाले ग्रह की संख्या से 2 बहन, मंगल से 1 भाई व 2 बहन, बुध से 2 भाई 2 बहन वाला कहना चाहिए। लड़की की जन्मकुंडली में पंचम भाव उसके पति के बड़े भाई-बहन का स्थान है। पंचम भाव में स्थित ग्रह तथा दृष्टि डालने वाले ग्रहों की कुल संख्या उसके पति के बड़े भाई-बहन की संख्या होगी। पुरुष ग्रह से भाई तथा स्त्री ग्रह से बहन समझना चाहिए।

पति का मकान कहां एवं कैसा होगा:
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लड़की की जन्म लग्न कुंडली में उसके लग्न भाव से तृतीय भाव पति का भाग्य स्थान होता है। इसके स्वामी के स्वक्षेत्री या मित्रक्षेत्री होने से पंचम और राशि वृद्धि से या तृतीयेश से पंचम जो राशि हो, उसी राशि का श्वसुर का गांव या नगर होगा। प्रत्येक राशि में 9 अक्षर होते हैं। राशि स्वामी यदि शत्रुक्षेत्री हो, तो प्रथम, द्वितीय अक्षर, सम राशि का हो, तो तृतीय, चतुर्थ अक्षर मित्रक्षेत्री हो, तो पंचम, षष्ठम अक्षर, अपनी ही राशि का हो तो सप्तम, अष्टम अक्षर, उच्च क्षेत्री हो, तो नवम अक्षर प्रसिद्ध नाम होगा। तृतीयेश के शत्रुक्षेत्री होने से जिस राशि म े ंहा े उसस े चतु र्थ राशि ससु राल या भवन की होगी। यदि तृतीय से शत्रु राशि में हो और तृतीय भाव में शत्रु राशि म े ंपड़ ाहो ,ता े दसवी ं राशि ससु रके गांव की होगी। लड़की की कुंडली में दसवां भाव उसके पति का भाव होता है। दशम भाव अगर शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, या दशमेश से युक्त या दृष्ट हो, तो पति का अपना मकान होता है। राहु, केतु, शनि, से भवन बहुत पुराना होगा। मंगल ग्रह में मकान टूटा होगा। सूर्य, चंद्रमा, बुध, गुरु एवं शुक्र से भवन सुंदर, सीमेंट का दो मंजिला होगा। अगर दशम स्थान में शनि बलवान हो, तो मकान बहुत विशाल होगा।

पति की नौकरी:
लड़की की जन्म लग्न कुंडली में चतुर्थ भाव पति का राज्य भाव होता है। अगर चतुर्थ भाव बलयुक्त हो और चतुर्थेश की स्थिति या दृष्टि से युक्त सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र की स्थिति या चंद्रमा की स्थिति उत्तम हो, तो नौकरी का योग बनता है।

पति की आयु:
लड़की के जन्म लग्न में द्वितीय भाव उसके पति की आयु भाव है। अगर द्वितीयेश शुभ स्थिति में हो या अपने स्थान से द्वितीय स्थान को देख रहा हो, तो पति दीर्घायु होता है। अगर द्वितीय भाव में शनि स्थित हो या गुरु सप्तम भाव, द्वितीय भाव को देख रहा हो, तो भी पति की आयु 75 वर्ष की होती है।