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*ज्योतिष के कुछ अद्भुत योग*
१. किसी जन्मकुंडली में लग्नेश और द्वितीयेश का स्थान परिवर्तन हो जाये ऐसी अवस्था मे जातक को कम प्रयत्न करने के बाद भी अच्छा धन प्राप्त होने के योग बनते हैं।
२. लग्नेश या द्वादश भाव मे बैठे तो "अवयोग" होता है ऐसे में जातक के शत्रु अधिक होंगे। जातक को जीवन मे कभी न कभी झूठे आरोप का सामना करना पड़ता हैं। जातक के मन मे कभी न कभी आत्महत्या करने जैसा विचार भी आता है।
३. लग्न का शुक्र जातक को गीत-संगीत का शौकीन, उत्तम वस्त्र और वैभवशाली जीवन को और आकर्षित करने वाला होता है।
४. किसी कुंडली मे द्वितीय भाव का स्वामी नवम या एकादश भाव मे बैठा हो तो जातक का बाल्यकाल थोड़ा कष्टदायी होता है किंतु ऐसा जातक किशोरावस्था के बाद का सम्पूर्ण जीवन बहुत सुख में व्यतीत करता है।
५. किसी कुंडली मे अष्टमेश किसी भी भाव मे स्थित हो और अष्टमेश पर गुरु की दृष्टि पड़ रही हो तो ऐसे जातक की आयु बहुत लंबी होती है।
६. यदि किसी कुंडली के एकादश भाव मे सूर्य स्थित हो तो ऐसे जातक के शत्रु बहुत अधिक होंगे, लेकिन जातक हमेशा अपने शत्रुओं को पराजित करेगा।
७. किसी की कुंडली मे राहू की महादशा चल रही हो, उसमे केतु की अंतर्दशा का समय जातक के जीवन में बहुत सी उलझन और कष्ट देने वाला होता है।
८. किसी महिला जातिका की कुंडली मे राहू यदि द्वितीय भाव मे स्थित हो, ऐसी जातिका को अपने जन्मस्थान पर कभी भी खुशी या आनंद प्राप्त नही होता है। ऐसे में उसे अपने जन्मस्थान से अलग राज्य में रहना या विदेश में रहना उसके सुखद जीवन के लिए श्रेष्ठ होता है। यदि ऐसी जातिका अपने जन्मस्थान पर ही रहे तो सदैव दुखी या अशांत ही होगी।
९. किसी महिला जातिका की कुंडली मे सूर्य तृतीय भाव मे हो और शनि षष्ठ भाव मे हो तो ऐसी जातिका निश्चित तौर पर किसी बड़े धनवान व्यक्ति या बड़े अधिकारी की जीवनसाथी होगी।
१०. किसी कुंडली में शनि अपनी उच्च राशि "तुला" में स्थित हो तथा कही से भी मंगल से दृष्ट हो तो ऐसा जातक निसन्देह एक "अच्छा वक्ता" या "नेता" बनेगा ऐसे जातक मे नेतृत्व के गुण स्वतः ही विकसित होते हैं।
११. कुंडली मे शुक्र एकादश भाव मेंहो तो जातक विवाह के बाद धनवान होता है।
१२. यदि किसी जातक की कुंडली मे केतु अष्टम भाव मे हो तो ऐसा जातक अपने जीवनकाल में आकस्मिक रूप से धनलाभ प्राप्त करता है।
१३. यदि अष्टम भाव मे मेष, वृषभ, मिथुन, कन्या, अथवा वृश्चिक राशि हो तो ऐसे जातक को पेट से संबंधित व्याधियां भी होती है।
१४. किसी जन्मकुंडली में शनि "वृषभ राशि" में हो तो ऐसा जातक क्रोधी प्रवृत्ति का होता है। जातक को क्रोध जल्दी आता हैं। ऐसे जातक को विवाह के बाद कुछ आर्थिक विषमताओ का भी सामना करना पड़ सकता है।
१५. किसी कुंडली मे "चन्द्र्मा" को छोड़कर कोई अन्य ग्रह सूर्य के दोनों और कोई भी ग्रह हो ऐसा जातक वाणी का थोड़ा तेज या तीखी होगी, साथ ही ऐसा जातक अधिकांश कार्यो में सफल होकर धनवान भी होगा।
१६. जन्म कुंडली मे लग्न स्थिर राशि (वृषभ, सिंह, वृश्चिक या कुंभ) हो और कही से भी छठे भाव के स्वामी की दृष्टी लग्न पर हो तो ऐसा जातक बहुत धनवान होकर अच्छी संपत्ति का स्वामी होता है।
१७. कुंडली मे एकादशेश यदि लग्न में आकर बैठ जाये तो जातक को ग्यारस या महीने की 11 तारीख को कुछ विशेष लाभ होने की संभावना होती है।
१८. किसी कुंडली मे शनि लग्न में हो तथा गुरु, केंद्र में हो तो ऐसा जातक अपने जीवन काल मे पैतृक संपत्ति अवश्य प्राप्त करता है।
१९. किसी कुंडली मे चन्द्रमा और बुध की युति केंद्र अथवा त्रिकोण में हो ऐसा जातक अत्यधिक विद्वान और बुद्धिमान होगा।
२०. किसी कुंडली मे चन्द्रमा किसी उच्च राशिस्थ ग्रह से दृष्ट हो, तो जातक अपने जीवनकाल मे धनवान अवश्य होता है।
*जन्मपत्री में आकस्मिक दुर्घटना के योग*
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ज्योतिष के दृष्टिकोण से कुछ विशेष ग्रह योग ही एक दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं तो आज हम एक्सीडैंट या दुर्घटना के पीछे की ग्रहस्थितियों के बारे में चर्चा करेंगे
"ज्योतिष में "मंगल" को दुर्घटना, या चोट लगना, हड्डी टूटना, जैसी घटनाओं का कारक ग्रह माना गया है "राहु" आकस्मिक घटनाओं को नियंत्रित करता है इसके आलावा "शनि" वाहन को प्रदर्शित करता है तथा गम्भीर स्थितियों का प्रतिनिधित्व करता है अब यहाँ विशेष बात यह है के अकेला राहु या शनि दुर्घटना की उत्पत्ति नहीं करते जब इनका किसी प्रकार मंगल के साथ योग होता है तो उस समय में दुर्घटनाओं की स्थिति बनती है। शनि,मंगल और राहु,मंगल का योग एक विध्वंसकारी योग होता है जो बड़ी दुर्घटनाओं को उत्पन्न करता है। जिस समय गोचर में शनि और मंगल एक ही राशि में हो, आपस में राशि परिवर्तन कर रहे हों या षडाष्टक योग बना रहे हों तो ऐसे समय में एक्सीडैंट और सड़क हादसों की संख्या बहुत बढ़ जाती है ऐसा ही राहु मंगल के योग से भी होता है। जिन व्यक्तियों की कुंडली में शनि,मंगल और राहु,मंगल का योग होता है उन्हें जीवन में बहुत बार दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है अतः ऐसे व्यक्तियों को वाहन आदि का उपयोग बहुत सजगता से करना चाहिए। किसी व्यक्ति के साथ दुर्घटना होने में उस समय के गौचर ग्रहों और ग्रह दशाओं की बड़ी भूमिका होती है जिसकी चर्चा हम आगे कर रहें हैं"
*कुछ विशेष योग*
1. यदि कुंडली में शनि मंगल का योग हो और शुभ प्रभाव से वंछित हो तो जीवन में चोट लगने और दुर्घटनाओं की स्थिति बार बार बनती है।
2. शनि मंगल का योग यदि अष्टम भाव में बने तो अधिक हानिकारक होता है ऐसे व्यक्ति को वाहन बहुत सावधानी से प्रयोग करना चाहिए।
3. यदि कुंडली में शनि और मंगल का राशि परिवर्तन हो रहा हो तब भी चोट आदि लगने की समस्या समय समय पर आती है।
4. कुंडली में राहु, मंगल की युति भी दुर्घटनाओं को बार बार जन्म देती है यह योग अष्टम भाव में बनने पर बहुत समस्या देता है।
5. यदि मंगल कुंडली के आठवें भाव में हो तो भी एक्सीडेंट आदि की घटनाएं बहुत सामने आती हैं।
6. मंगल का नीच राशि (कर्क) में होना तथा मंगल केतु का योग भी बार बार दुर्घटनाओं का सामना कराता है।
*दुर्घटना काल*
एक्सीडैंट की घटनाएं कुछ विशेष ग्रहस्थिति और दशाओं में बनती हैं
1. व्यक्ति की कुंडली में मंगल जिस राशि में हो उस राशि में जब शनि गोचर करता है तो ऐसे में एक्सीडैंट की सम्भावना बनती हैं।
2. कुंडली में शनि जिस राशि में हो उस राशि में मंगल गोचरवश जब आता है तब चोट आदि लगने की सम्भावना होती है।
3. जब कुंडली में मंगल जिस राशि में हो उसमे राहु गोचर करे या राहु जिस राशि में कुंडली में स्थित हो उसमे मंगल गोचर करे तो भी एक्सीडैंट की स्थिति बनती है।
4. जब जन्मकुंडली में दशावश राहु और मंगल का योग हो अर्थात राहु और मंगल की दशाएं एक साथ चल रही हों ( राहु में मंगल या मंगल में राहु ) तो भी एक्सीडेंट होने का योग बनता है ऐसे समय में वाहन चलाने में सतर्कता बरतनी चाहिए।
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*॥ जय माँ आदिशक्ति॥*
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