Wednesday, September 21, 2022

वक्फ अधिनियम 1995

 *वक्फ अधिनियम 1995* (विशेषज्ञों द्वारा व्याख्या की गई)


 इस मैसेज में आपको सरल भाषा में जानने को मिलेगा:-


 *वक्फ या वक्फ बोर्ड क्या है?*

 *वक्फ अधिनियम 1995 क्या है?*

 *वक्फ बोर्डों के क्या अधिकार हैं?*

 *क्या वक्फ बोर्ड आपके घर को अपनी संपत्ति के रूप में दावा कर सकता है?*


 *इस संदेश को पढ़ने के बाद, आप एक विशेष राजनीतिक दल से नफरत करेंगे और यह जानकर चौंक जाएंगे कि एक धर्मनिरपेक्ष देश में ऐसा कृत्य मौजूद है।*


*किसी भी मुस्लिम देश में ऐसा कानून नहीं है।*


 *वक्फ सिस्टम क्या है* ?


 *यह मुस्लिम ब्रदरहुड चैरिटी सिस्टम का एक हिस्सा है।*


मान लीजिए अहमद 80 साल के हैं। उनके पास दो फ्लैट हैं। मरने से पहले वह एक फ्लैट अपने समुदाय के लिए दान करना चाहता है, इसलिए उसने एक फ्लैट वक्फ को दान कर दिया। वह दान की गई संपत्ति अब अल्लाह की है। वक्फ बोर्ड उस फ्लैट का मालिक नहीं बल्कि केयरटेकर है और वे उस फ्लैट का इस्तेमाल मुस्लिम स्कूल, हॉस्टल, कम्युनिटी हॉल या अपने समुदाय के लिए कर सकते हैं।

 *तो वक्फ अल्लाह की जागीर है, जो मुसलमानों के लिए दान किया जाता है।*


 *हालांकि समय के साथ यह अर्थ बदल गया।*


 *1947 में हिंदू पाकिस्तान में अपनी जमीन छोड़कर भारत आ गए और मुसलमान भारत में अपनी जमीन छोड़कर पाक चले गए।*

 पाक ने पाकिस्तान में हिंदुओं की सारी जमीन जब्त कर ली और वह जमीन मुसलमानों और राज्य सरकार को दे दी, लेकिन गांधी और नेहरू ने इसके विपरीत किया।


 *उन्होंने कहा कि जो मुसलमान पाक गए हैं, उनकी किसी भी भूमि को कोई भी हिंदू नहीं छुएगा। उन्होंने वह सारी जमीन बटोर ली और वक्फ को दे दी।*

 वक्फ बोर्ड 1954 अधिनियम उस समय कठोर नहीं था, लेकिन वास्तविक परिवर्तन 1995 में आया।


 *कांग्रेस नेता पीएम पीवी नरसिम्हा राव ने वक्फ अधिनियम 1995 लाया और उन्हें भूमि अधिग्रहण करने के लिए असीमित अधिकार दिए।*


 *आइए बात करते हैं वक्फ अधिनियम के प्रावधान क्या हैं:*


 *धारा 3 (आर)*

 *वक्फ क्या है* - मुस्लिम कानून द्वारा धार्मिक, धार्मिक या धर्मार्थ के रूप में मान्यता प्राप्त किसी भी उद्देश्य के लिए कोई संपत्ति।


 *इसलिए मुस्लिम कानून के अनुसार (भारतीय कानून नहीं) अगर उन्हें लगता है कि जमीन मुस्लिम की है तो वह वक्फ हो जाती है।*

 तो मान लीजिए आपने 2010 में रमेश से जमीन खरीदी थी और रमेश ने 1965 में सलीम से जमीन खरीदी थी तो वक्फ बोर्ड दावा कर सकता है कि 1964 में सलीम ने वह जमीन वक्फ को दी थी और अब वह जमीन उनकी है।

 अब आप क्या कर सकते हैं?

 आप कोर्ट नहीं जा सकते........आपको स्टेट वक्फ बोर्ड जाना है।


 *वक्फ बोर्ड क्या है* ?

 *भारत में एक केंद्रीय वक्फ बोर्ड और 32 राज्य वक्फ बोर्ड हैं।*


 *वक्फ बोर्ड सात व्यक्तियों की एक समिति है। वे सभी व्यक्ति मुसलमान होने चाहिए।*

*कांग्रेस पार्टी ने मंदिर अधिनियम लाया और राज्य द्वारा सभी मंदिरों पर कब्जा कर लिया और कहा कि एक गैर हिंदू भी मंदिर बोर्ड का सदस्य बन सकता है लेकिन वही कांग्रेस ने वक्फ अधिनियम लाया, उन्हें स्वायत्त रखा और लिखा कि कोई भी गैर मुस्लिम वक्फ बोर्ड का हिस्सा नहीं बन सकता है।*


 *वक्फ बोर्ड में एक सर्वेक्षक होता है जो सभी जमीनों का सर्वेक्षण करता रहता है और अगर उसे लगता है कि कोई संपत्ति वक्फ की है तो वक्फ नोटिस जारी कर सकता है।*


 *धारा 4 सर्वेक्षक को असीमित शक्ति प्रदान करती है।*


 *वक्फ का नेतृत्व सीईओ करते हैं जो मुस्लिम होना चाहिए। धारा 28 वक्फ सीईओ को कलेक्टर को आदेश देने की शक्ति देती है।*

 इसलिए यदि आपको कोई नोटिस मिलता है, तो आपको सभी चित्र, रजिस्ट्री, कागज ले जाने होंगे और उन्हें यह समझाने के लिए वक्फ बोर्ड के पास भागना होगा कि यह आपकी जमीन है।

 (अर्थात उसी बोर्ड को जिसने आपको नोटिस भेजा है)।


 *अब वक्फ अधिनियम का सबसे कठोर लेख आता है,*

 *अनुच्छेद 40*। यह लेख भयानक है

 चाहे आपकी जमीन हो या वक्फ जमीन यह वक्फ बोर्ड द्वारा तय किया जाएगा और उनका फैसला अंतिम होगा।


 * इसलिए

 *वक्फ पुलिस है*।

 *वक्फ वकील है*।

 *वक्फ जज है*।


 ** तो अगर आप वक्फ को संतुष्ट नहीं कर सकते कि यह आपकी जमीन है तो आपको अपनी जमीन खाली करने के लिए कहा जाएगा।

 आप किसी कोर्ट में नहीं जा सकते।

 आप केवल वक्फ ट्रिब्यूनल कोर्ट जा सकते हैं।

 हर राज्य में केवल एक या दो वक्फ ट्रिब्यूनल कोर्ट हैं। तो आपको राजधानी जाना होगा और वहां अपना केस दर्ज करना होगा।

 धारा 83 इसी ट्रिब्यूनल के बारे में है।


 ट्रिब्यूनल में दो न्यायाधीश (कोई धर्म निर्दिष्ट नहीं) और एक प्रतिष्ठित मुस्लिम होगा। आप ट्रिब्यूनल में अपना केस लड़ते हैं और मान लेते हैं कि आप ट्रिब्यूनल में भी अपना केस हार जाते हैं तो आपके लिए क्या विकल्प हैं? ...... और यहाँ धारा 85 में एक और बम आता है।


 *धारा 85 कहती है कि न्यायाधिकरण का निर्णय अंतिम होता है।*

*कोई भी सिविल कोर्ट (सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट) ट्रिब्यूनल कोर्ट के आदेश को नहीं बदल सकता है। (हालांकि बाद में मई 2022 में राजस्थान जिंदल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस खंड को रद्द कर दिया था)।*


 *सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उनसे श्रेष्ठ कोई न्यायालय नहीं है और वे किसी भी निर्णय में हस्तक्षेप कर सकते हैं।*


 *2005 में, यूपी वक्फ बोर्ड ने एएसआई के खिलाफ ताजमहल के स्वामित्व का दावा किया। हालांकि वे सुप्रीम कोर्ट में केस हार गए।*


 *उन्होंने ज्ञानवापी मामले में भी वक्फ अधिनियम के प्रावधानों का इस्तेमाल किया लेकिन वहां भी वे केस हार गए।*


 *मुद्दा अब शक्तिशाली है कि लोग महंगे वकील रख सकते हैं और सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं लेकिन आम आदमी का क्या?*


 *तमिलनाडु में वक्फ ने हाल ही में थिरुचेंदुरई के एक पूरे गांव पर दावा किया, जिसमें 1500 साल से अधिक पुराना मंदिर शामिल था।*


 *जब वक्फ किसी जमीन पर दावा करता है तो उसे साबित करने की जिम्मेदारी उनकी नहीं होती। स्वामित्व साबित करना पीड़ित का दायित्व बन जाता है।*


 *प्रश्न यह है कि धर्मनिरपेक्ष देश में धार्मिक कृत्य कैसे हो सकता है?.....*


 1. हिंदुओं, ईसाइयों और सिखों के लिए और केवल मुसलमानों के लिए ऐसा कोई कार्य क्यों नहीं है?


 2. यदि कोई ईसाई, सिख, जैन किसी हिंदू भूमि का अतिक्रमण करता है या इसके विपरीत, तो उन्हें दीवानी अदालत में जाना पड़ता है लेकिन अगर कोई मुस्लिम हिंदू या किसी अन्य धर्म की भूमि का अतिक्रमण करता है तो उन्हें वक्फ ट्रिब्यूनल जाना होगा?


 *यह विशेषाधिकार सिर्फ एक धर्म को ही क्यों ?*


 *इस कठोर अधिनियम के कारण, वक्फ 6 लाख संपत्ति के साथ 12 लाख करोड़ से अधिक के बाजार मूल्य के साथ भारत का सबसे धनी निकाय बन गया है।*


 *वक्फ इस जमीन को किराए पर देता है और इससे करोड़ों रुपये कमाता है जो उनके धार्मिक उत्थान, लड़ाई के मामलों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।*

 इसके अलावा सरकार उन्हें वित्तीय सहायता प्रदान करती है।


 *दूसरी तरफ सरकार हिंदू मंदिरों से हर साल एक लाख करोड़ रुपये लेती है जो गैर हिंदू कार्यों के लिए उपयोग किए जाते हैं जबकि दूसरी तरफ सरकारी धन वक्फ के लिए जो पहले से ही एक समृद्ध निकाय है।*


 *वक्फ अधिनियम को समाप्त करने के लिए सरकार को तत्काल आवश्यकता है। सभी धर्मों के लिए एक ही कार्य होना चाहिए।*

 आप पूरा वक्फ एक्ट 95 यहां पढ़ सकते हैं...


 indiankanoon.org/doc/631210/

 या

 अल्पसंख्यकअफेयर्स.gov.in/en/acts

 महत्वपूर्ण खंड: 3 (आर), 4,6,7,11,19,23, 23,29,30,40,77,83,85,99


 *वक्फ सदस्यों को वक्फ फंड द्वारा वेतन और भत्ते प्रदान किए जाते हैं।

 वक्फ के पास प्रशासनिक, पर्यवेक्षी और न्यायिक शक्तियां हैं ।

 लेकिन जैसे-जैसे IAS, IPS में जनसांख्यिकी परिवर्तन होगा, वक्फ अधिनियम दस गुना अधिक घातक हो जाएगा।

 वक्फ अधिनियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।


 * भारतीय संविधान किसी भी ऐसे कार्य की अनुमति नहीं देता है जो धार्मिक हो और अन्य धर्मों के अधिकार का अतिक्रमण करता हो।


 *वक्फ एक्ट 1995 को खत्म करें*

Saturday, September 17, 2022

साँप सीढ़ी नहीं मोक्षपटनम है।

 सनातन धर्म एक जीवन पद्धति है ....हमारे पूर्वजो द्वारा इसे समझाने का सरल तरीका ..आप भी अपने पूर्वजों के प्रति नमन करने को मजबूर हो जायेगे। 


       13 वीं सदी के कवि संत "ज्ञान देव" ने "मोक्षपटनम"  नामक बच्चों का खेल बनाया । अंग्रेजों ने बाद में इसे सांप _ और _ सीढ़ी का नाम दिया और पूरे ज्ञान को धूमिल कर दिया....  मूल मोक्षपटनम के बजाय!!

         मूल एक सौ वर्ग खेल बोर्ड में, 12 वां वर्ग विश्वास था, 51 st वर्ग विश्वसनीयता थी, 57 वीं वर्ग उदारता थी, 76 वीं वर्ग ज्ञान था, और 78 दसवीं वर्ग की तपस्या थी । ये वे वर्ग थे जहां सीढ़ी मिली और एक तेजी से आगे बढ़ सकता था ।

        पहला वर्ग अवज्ञा के लिए था, अहंकार के लिए 44 वां वर्ग, अश्लीलता के लिए 49 वां वर्ग, चोरी के लिए दूसरा वर्ग, झूठ बोलने के लिए 58 वां वर्ग, 62 मादकता के लिए दूसरा वर्ग, कर्ज के लिए 69 वां वर्ग, क्रोध के लिए 84 वां वर्ग, लालच के लिए दूसरा वर्ग, गर्व के लिए 95 वां वर्ग, हत्या के लिए तीसरा वर्ग और वासना के लिए 99 वां वर्ग । ये वो वर्ग थे, जहां सांप अपने मुंह से खुले हुए इंतजार कर रहा था । 100 वां वर्ग निर्वाण या मोक्ष का प्रतिनिधित्व करता है । 


🚩🚩

क्षीरसागर का आश्चर्य स्वरूप

 अद्भुत-अकल्पनीय-अविश्वसनीय




हम सबने सुना है और फोटो में देखा है कि भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग के ऊपर लेटे हुए हैं .


लेकिन, कोई नहीं जानता था कि आखिर ये क्षीर सागर है कहाँ..


कोई कैस्पियन सागर को क्षीर सागर बताता था तो कोई अटलांटिक महासागर के झाग को क्षीर सागर बताता था..

तो, कोई  कैलाश पर्वत के पास क्षीर सागर की मौजूदगी बताते थे.


लेकिन, यह जानकर आपके हैरानी की सीमा नहीं रहेगी कि....


नासा के खगोलविदों ने अंतरिक्ष में तैरते हुए एक विशाल महासागर की खोज की है जो पृथ्वी के सभी महासागरों से करोड़ो गुणा बड़ा है जिसमें पृथ्वी पर मौजूद कुल पानी से 140 ट्रिलियन गुणा अधिक पानी है.

(1 ट्रिलियन = 1 लाख करोड़)


अंतरिक्ष में पानी का ये असीमित महासागर हमारी पृथ्वी से लगभग 12 अरब प्रकाश वर्ष दूर है.

(1 प्रकाशवर्ष = 1 साल में प्रकाश जितनी दूरी तय कर पाती है)


जहाँ यह सैकड़ों प्रकाश-वर्ष के क्षेत्र में फैला हुआ है.


जिसकी खोज खगोलविदों की दो टीमों ने की है... 


इस महासागर को क्वासर के गैसीय क्षेत्र में खोजा गया है...

जो एक ब्लैक होल द्वारा संचालित आकाशगंगा के केंद्र में एक शानदार कॉम्पैक्ट क्षेत्र है.

(उस महासागर का फोटो संलग्न है)


हालांकि, यह विशेषज्ञों के लिए आश्चर्य की बात नहीं है... 

लेकिन, इससे पहले कभी भी पानी की खोज नहीं की गई थी.


क्वासर से प्रकाश ( विशेष रूप से, लिंक्स नक्षत्र में एपीएम 08279 + 5255 क्वासर) को पृथ्वी तक पहुंचने में 12 अरब वर्ष लगे...


जिसका अर्थ है कि पानी का यह द्रव्यमान उस समय से अस्तित्व में है जब ब्रह्मांड केवल 1.6 अरब वर्ष पुराना था.


इसके लिए एक टीम ने हवाई में कैल्टेक सबमिलिमीटर वेधशाला में जेड-स्पेक उपकरण का इस्तेमाल किया.


जबकि दूसरे ने फ्रांसीसी आल्प्स में पठार डी ब्यूर इंटरफेरोमीटर का इस्तेमाल किया.


ये सेंसर मिलीमीटर और सबमिलीमीटर तरंग दैर्ध्य का पता लगाते हैं... 


जिससे, प्रारंभिक ब्रह्मांड में मौजूद गैसों एवं जल वाष्प के विशाल जलाशय का पता लगाया जा सकता है.


क्वासर में पानी के कई वर्णक्रमीय उंगलियों के निशान की खोज ने शोधकर्ताओं को जलाशय के विशाल परिमाण की गणना करने के लिए आवश्यक डेटा प्रदान किया.


अगर इतने सारे टेक्निकल पॉइंट को छोड़ दिया जाए तो एक लाइन में कह सकते हैं कि... 

हमारे वेदों एवं विष्णु पुराण में अंतरिक्ष में मौजूद इस तरह के जलाशय (क्षीर सागर) का वर्णन उस समय से है...


जब बाकी दुनिया को ये तक नहीं मालूम था कि धरती चपटी है या गोल है.


और, नासा की इस पुष्टि के बाद... आखिर हमें हमारे धर्मग्रंथों एवं खुद के सनातनी होने पर क्यों गर्व नहीं होना चाहिए ???


हरि ॐ...!! 🚩


फोटो एवं डिटेल : साभार NASA

Thursday, July 7, 2022

देवभाषा संस्कृत

 • संस्कृत भाषा का चमत्कार देखिए ।


अहिः = सर्पः


अहिरिपुः = गरुडः


 अहिरिपुपतिः = विष्णुः


अहिरिपुपतिकान्ता = लक्ष्मीः


अहिरिपुपतिकान्तातातः = सागरः


अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धः = रामः


अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ता = सीता


अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरः = रावणः


अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयः = मेघनादः


 अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्ता = लक्ष्मणः =


अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदाता = हनुमान्


अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजः = अर्जुनः


अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसख = श्रीकृष्णः

 अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतः = प्रद्युम्नः

 अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतः = अनिरुद्धः


अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतकान्ता = उषा


अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतकान्तातातः = बाणासुरः


अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतकान्तातातसम्पूज्यः = शिवः

 अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतकान्तातातसम्पूज्यकान्ता = पार्वती


अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतकान्तातातसम्पूज्यकान्तापिता = हिमालयः


अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतकान्तातातसम्पूज्यकान्तापितृशिरोवहा = गङ्गा, सा मां पुनातु इति अन्वयः 


● विश्व की किसी अन्य भाषा में इतना सामर्थ्य नहीं है ।


संस्कृत भाषा का सामर्थ देखिए शायद ही कोई भाषा होगी जो इतनी समर्थवान होगी, इसीलिए इसको देव भाषा भी कहा जाता है।🌸


आपसे एक निवेदन है इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं🙏

Monday, July 4, 2022

अपनी सभ्यता की ओर ध्यान दें

 *यह कहानी किसी ने मुझे भेजी है ; अच्छी लगी तो सोचा आप सबको भी बताऊँ* 


कृपया पढ़ें : ‐


*वासु भाई और वीणा बेन* गुजरात के एक शहर में रहते हैं; आज दोनों यात्रा की तैयारी कर रहे थे 


3 दिन का अवकाश था; पेशे से चिकित्सक हैं 


लंबा अवकाश नहीं ले सकते थे। परंतु जब भी दो-तीन दिन का अवकाश मिलता छोटी यात्रा पर कहीं चले जाते हैं 

           

आज उनका इंदौर- उज्जैन जाने का विचार था


दोनों जब साथ-साथ मेडिकल कॉलेज में पढ़ते थे, वहीं पर प्रेम अंकुरित हुआ था और बढ़ते-बढ़ते वृक्ष बना 


दोनों ने परिवार की स्वीकृति से विवाह किया


2 साल हो गए,अभी संतान कोई है नहीं, इसलिए यात्रा का आनंद लेते रहते हैं 

             

विवाह के बाद दोनों ने अपना निजी अस्पताल खोलने का फैसला किया, बैंक से लोन लिया 


वीणाबेन स्त्री-रोग विशेषज्ञ और वासु भाई डाक्टर आफ मैडिसिन हैं 


इसलिए दोनों की कुशलता के कारण अस्पताल अच्छा चल निकला


यात्रा पर रवाना हुए, आकाश में बादल घुमड़ रहे थे 


मध्य-प्रदेश की सीमा लगभग 200 कि मी दूर थी; बारिश होने लगी थी


म.प्र. सीमा से 40 कि.मी. पहले छोटा शहर पार करने में समय लगा 


कीचड़ और भारी यातायात में बड़ी कठिनाई से दोनों ने रास्ता पार किया


भोजन तो मध्यप्रदेश में जाकर करने का विचार था : परंतु *चाय का समय* हो गया था


उस छोटे शहर से ४-५ कि.मी. आगे निकले


सड़क के किनारे एक छोटा सा मकान दिखाई दिया;जिसके आगे वेफर्स के पैकेट लटक रहे थे 


उन्होंने विचार किया कि यह कोई होटल है 


वासुभाई ने वहां पर गाड़ी रोकी, दुकान पर गए, कोई नहीं था 


आवाज लगाई ! अंदर से एक महिला  निकल कर आई 


उसने पूछा, "क्या चाहिए भाई ?"

           

वासुभाई ने दो पैकेट वेफर्स के लिए और "कहा बेन !! दो कप चाय बना देना ; थोड़ी जल्दी बना देना, हमको दूर जाना है"


पैकेट लेकर गाड़ी में गए ; दोनों ने पैकेट के वैफर्स का नाश्ता किया ; चाय अभी तक आई नहीं थी 

         

दोनों कार से निकल कर दुकान में रखी हुई कुर्सियों पर बैठे 


वासुभाई ने फिर आवाज लगाई

          

थोड़ी देर में वह महिला अंदर से आई और बोली, "भाई! बाड़े में तुलसी लेने गई थी, तुलसी के पत्ते लेने में देर हो गई ; अब चाय बन रही है"


थोड़ी देर बाद एक प्लेट में दो मैले से कप लेकर वह गरमा गरम चाय लाई 

            

मैले कप देखकर वासु भाई एकदम से  अपसेट हो गए और कुछ बोलना चाहते थे ; परंतु वीणाबेन ने हाथ पकड़कर उन्हें रोक दिया

            

चाय के कप उठाए; उनमें से अदरक और तुलसी की सुगंध निकल रही थी 


दोनों ने चाय का एक  सिप लिया 


ऐसी स्वादिष्ट और सुगंधित चाय जीवन में पहली बार उन्होंने पी : उनके मन की  हिचकिचाहट दूर हो गई


उन्होंने महिला को चाय पीने के बाद पूछा, कितने पैसे ?


महिला ने कहा, "बीस रुपये"


वासुभाई ने सौ का नोट दिया 

          

महिला ने कहा कि भाई छुट्टा नहीं है; 20 ₹ छुट्टा दे दो 


वासुभाई ने बीस रु का नोट दिया 


महिला ने सौ का नोट वापस किया 


वासुभाई ने कहा कि हमने तो वैफर्स के पैकेट भी लिए हैं !

         

महिला बोली, "यह पैसे उसी के हैं ; चाय के नहीं" 


अरे! चाय के पैसे क्यों नहीं लिए ?


जवाब मिला *हम चाय नहीं बेंचते हैं*  यह होटल नहीं है


"फिर आपने चाय क्यों बना दी ?"


"अतिथि आए !! आपने चाय मांगी, हमारे पास दूध भी नहीं था ; यह बच्चे के लिए दूध रखा था, परंतु आपको मना कैसे करते; इसलिए इसके दूध की चाय बना दी"


*अब बच्चे को क्या पिलाओगे*


"एक दिन दूध नहीं पिएगा तो मर नहीं जाएगा"  


इसके पापा बीमार हैं; वह शहर जाकर दूध ले आते, पर उनको कल से बुखार है; आज अगर ठीक हो गऐ तो कल सुबह जाकर दूध ले आएंगे" 

            

वासुभाई उसकी बात सुनकर सन्न  रह गये 


इस महिला ने होटल न होते हुए भी अपने बच्चे के दूध से चाय बना दी और वह भी  केवल इसलिए कि मैंने कहा था ; अतिथि रूप में आकर

 

*संस्कार और सभ्यता* में महिला मुझसे बहुत आगे है

            

उन्होंने कहा कि हम दोनों डॉक्टर हैं : आपके पति कहां हैं 


महिला उनको भीतर ले गई ; अंदर गरीबी पसरी हुई थी


एक खटिया पर सज्जन सोए हुए थे ; बहुत दुबले पतले थे 

           

वासुभाई ने जाकर उनके माथे पर हाथ रखा ; माथा और हाथ गर्म हो रहे थे और कांप भी रहे थे  


वासुभाई वापस गाड़ी में गए; दवाई का अपना बैग लेकर आए; उनको दो-तीन टेबलेट निकालकर खिलाई और कहा:- "इन गोलियों से इनका रोग ठीक नहीं होगा"

          

मैं पीछे शहर में जा कर इंजेक्शन और दवाई की बोतल ले आता हूं 


वीणाबेन को उन्होंने मरीज के पास बैठने को कहा


गाड़ी लेकर गए, आधे घंटे में शहर से बोतल, इंजेक्शन ले कर आए और साथ में दूध की थैलियां  भी लेकर आये 

             

मरीज को इंजेक्शन लगाया, बोतल चढ़ाई और जब तक बोतल लगी दोनों वहीं बैठे रहे 


एक बार और तुलसी अदरक की चायबनी


दोनों ने चाय पी और उसकी तारीफ की


जब मरीज 2 घंटे में थोड़े ठीक हुआ तब वह दोनों वहां से आगे बढ़े 

     

3 दिन इंदौर-उज्जैन में रहकर, जब लौटे तो उनके बच्चे के लिए बहुत सारे खिलौने और दूध की थैलियां लेकर आए 

           

वापस उस दुकान के सामने रुके; 


महिला को आवाज लगाई तो दोनों  बाहर निकले और उनको देखकर बहुत  खुश हुए 


उन्होंने कहा कि आपकी दवाई से दूसरे दिन ही बिल्कुल ठीक हो गये 

             

वासुभाई ने बच्चे को खिलोने दिए ; दूध के पैकेट दिए


फिर से चाय बनी, बातचीत हुई, अपना पन स्थापित हुआ। 


वासुभाई ने अपना एड्रेस कार्ड देकर कहा, "जब कभी उधर आना हो तो जरूर मिलना


और दोनों वहां से अपने शहर की ओर लौट गये 

         

शहर पहुंचकर वासु भाई ने उस महिला  की बात याद रखी; फिर एक फैसला लिया :

            

अपने अस्पताल में रिसेप्शन पर बैठे हुए व्यक्ति से कहा कि अब आगे से जो भी मरीज आयें: केवल उनका नाम लिखना, फीस नहीं लेना ; फीस मैं खुद लूंगा 

            

और जब मरीज आते तो अगर वह गरीब मरीज होते तो उन्होंने उनसे फीस  लेना बंद कर दिया 


केवल संपन्न मरीज  देखते तो ही उनसे फीस लेते 

             

धीरे-धीरे शहर में उनकी प्रसिद्धि फैल गई  


दूसरे डाक्टरों ने सुना तो उन्हें लगा कि इससे तो हमारी प्रैक्टिस भी कम हो जाएगी और लोग हमारी निंदा करेंगे  


उन्होंने एसोसिएशन के अध्यक्ष से कहा :

          

एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. वासुभाई से मिलने आए और उन्होंने कहा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं ?

              

तब वासुभाई ने जो जवाब दिया उसको सुनकर उनका मन भी पुलकित हो गया


वासुभाई ने कहा कि मैं मेरे जीवन में हर परीक्षा में मैरिट में पहली पोजीशन पर आता रहा हूँ ; एम.बी.बी.एस. में भी, एम.डी. में भी गोल्ड मेडलिस्ट बना परंतु *सभ्यता, संस्कार और अतिथि सेवा* में वह गांव की महिला जो बहुत गरीब है, वह मुझसे आगे निकल गयी : तो मैं अब पीछे कैसे रहूंँ? 


इसलिए मैं : 

*अतिथि-सेवा और मानव-सेवा में भी गोल्ड मैडलिस्ट बनूंगा* 


इसलिए मैंने यह सेवा प्रारंभ की है 


और मैं यह कहता हूँ कि हमारा व्यवसाय मानव सेवा का ही है 


सारे चिकित्सकों से भी मेरी अपील है कि वह सेवा-भावना से काम करें


गरीबों की निशुल्क सेवा करें, उपचार करें 


यह व्यवसाय धन कमाने का नहीं है 


*परमात्मा ने हमें मानव-सेवा का अवसर प्रदान किया है*


एसोसिएशन के अध्यक्ष ने वासुभाई को प्रणाम किया और धन्यवाद देकर उन्होंने कहा कि मैं भी आगे से ऐसी ही भावना रखकर चिकित्सा-सेवा करुंगा


*कभी-कभार ऐसी पोस्ट भी वाट्सएप पर आ जाती हैं और फॉरवर्ड करने को मजबूर कर देती हैं*


 🌹🌹🙏🙏🕉️🙏🙏🌹🌹

Thursday, June 16, 2022

ये कैसा विवाह है?

 *क्या नाचने गाने को विवाह कहते हैं, क्या दारू पीकर हुल्लड़ मचाने को विवाह कहते हैं, क्या रिश्तेदारों और दोस्तों को इकट्ठा करके दारु की पार्टी को विवाह कहते हैं ? डीजे बजाने को विवाह कहते हैं, नाचते हुए लोगों पर पैसा लुटाने को विवाह कहते हैं, घर में सात आठ दिन धूम मची रहे उसको विवाह कहते हैं? दारू की 20-25 पेटी लग जाए उसको विवाह कहते हैं ? किसको विवाह कहते हैं?*

*विवाह उसे कहते हैं जो बेदी के ऊपर मंडप के नीचे पंडित जी मंत्रोच्चारण के साथ देवताओं का आवाहन करके विवाह की वैदिक रस्मों को कराने को विवाह कहते हैं।*


 *लोग कहते हैं कि हम आठ 8 महीने से विवाह की तैयारी कर रहे हैं और पंडित जी जब सुपारी मांगते हैं तो कहते हैं अरे वह तो भूल गए जो सबसे जरूरी काम था वह आप भूल गए विवाह की सामग्री भूल गए और वैसे तुम 10 महीने से विवाह की कोनसी तैयारी कर रहे हैं।*

*विवाह - नहीं साहब आप दिखावे की तैयारी कर रहे हो कर्जा ले लेकर दिखावा कर रहे हो हमारे ऋषियों ने कहा है जो जरूरी काम है वह करो । ठीक है अब तक लोगों की पार्टियां खाई है तो खिलानी भी पड़ेगी ठीक है समय के साथ रीति रिवाज बदल गए हैं मगर दिखावे से बचे।*

*मैं कहना चाहता हूं आज आप दिखावा करना चाहते हो करो खूब करो मगर जो असली काम है जिसे सही मायने में विवाह कहते हैं वह काम गौण ना हो जाऐ, 6 घंटे नाचने में लगा देंगे, 4 घंटे मेहमानो से मिलने में लगा देंगे', 3 घंटे जयमाला में लगा देंगे, 4 घंटे फोटो खींचने में लगा देंगे और पंडित जी के सामने आते ही कहेंगे पंडितजी जी जल्दी करो जल्दी करो , पंडित जी भी बेचारे क्या करें वह भी कहते है सब स्वाहा स्वाहा जब तुम खुद ही बर्बाद होना चाहते हो तो पूरी रात जगना पंडित जी के लिए जरूरी है क्या उन्हें भी अपना कोई दूसरा काम ढूंढना है उन्हें भी अपनी जीविका चलानी है, मतलब असली काम के लिए आपके पास समय नहीं है। मेरा कहना यह है कि आप अपने सभी नाते, रिश्तेदार, दोस्त ,भाई, बंधुओं को कहो कि आप जो यह फेरों का काम है वह किसी मंदिर, गौशाला, आश्रम या धार्मिक स्थल पर किसी पवित्र स्थान पर करें ।*

  *जहां दारू पीगई हों जहां हड्डियां फेंकी गई हों क्या उस मैरिज हाउस उह पैलेस कंपलेक्स मैं देवता आएंगे, आशीर्वाद देने के लिए, आप हृदय से सोचिए क्या देवता वहां आपको आशीर्वाद देने आऐंगे, आपको नाचना कूदना, खाना-पीना जो भी करना है वह विवाह वाले दिन से पहले या बाद में करे मगर विवाह का कोई एक मुहूर्त का दिन निश्चित करके उस दिन सिर्फ और सिर्फ विवाह से संबंधित रीति रिवाज होने चाहिए , और यह शुभ कार्य किसी पवित्र स्थान पर करें। जिस मै गुरु जन आवें, घर के बड़े बुजुर्गों का जिसमें आशीर्वाद मिले ।*

*आप खुद विचार करिये हमारे घर में कोई मांगलिक कार्य है जिसमें सब आये और अपने ठाकुर को भूल जाऐं अपने भगवान को भूलजाऐं अपने कुल देवताओं को भूलजाये।*

*मेरा आपसे करबद्ध निवेदन है कि विवाह नामकरण अन्य जो धार्मिक उत्सव है वह शराब के साथ संपन्न ना हो उन में उन विषय वस्तुओं को शामिल ना करें जो धार्मिक कार्यों में निषेध है ।*

Friday, April 15, 2022

शिखा (चोटी) का महत्व

 *💠🛑 शिखा (चोटी) 🛑💠*

➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖


*🔶 शिखा का महत्त्व विदेशी जान गए, पर हिन्दू भूल गए । हिन्दू धर्म का छोटे से छोटा सिद्धान्त, छोटी से छोटी बात भी अपनी जगह पूर्णतया वैज्ञानिक एवं कल्याणकारी है । छोटी सी शिखा अर्थात् चोटी भी कल्याण एवं विकास का साधन बनकर अपनी पूर्णता व आवश्यकता को दर्शाती है । शिखा का त्याग करना मानो अपने कल्याण का त्याग करना है । जैसे घड़ी के छोटे पुर्जे की जगह बडा पुर्जा काम नहीं कर सकता, क्योंकि भले वह छोटा है, परन्तु उसकी अपनी महत्ता है । शिखा न रखने से हम जिस लाभ से वंचित रह जाते हैं, उसकी पूर्ति अन्य किसी साधन से नहीं हो सकती ।*


*🔶 हरिवंश पुराण में एक कथा आती है - हैहय व तालजंघ वंश के राजाओं ने शक, यवन, काम्बोज, पारद आदि राजाओं को साथ लेकर राजा बाहु का राज्य छीन लिया था । राजा बाहु अपनी पत्नी के साथ वन में चले गए । वहाँ राजा की मृत्यु हो गयी । महर्षि और्व ने उसकी गर्भवती पत्नी की रक्षा की और उसे अपने आश्रम में ले आए । वहाँ उसने एक पुत्र को जन्म दिया, जो आगे चलकर राजा सगर के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।*


*🔶 राजा सगर ने महर्षि और्व से शस्त्र व शास्त्र की विद्या सीखी । समय पाकर राजा सगर ने हैहयों को मार डाला और फिर शक, यवन, काम्बोज, पारद आदि राजाओं को भी मारने का निश्चय किया । ये शक, यवन आदि राजा महर्षि वसिष्ठ की शरण में चले गए । महर्षि वसिष्ठ ने उन्हें कुछ शर्तों पर अभयदान दे दिया और राजा सगर को आज्ञा दी कि वे उनको न मारे । राजा सगर अपनी प्रतिज्ञा भी नहीं छोड़ सकते थे और महर्षि वसिष्ठ जी की आज्ञा भी नहीं टाल सकते थे । इसलिए उन्होंने उन राजाओं का सिर शिखा सहित मुँडवाकर छोड़ दिया ।*


*🔶 प्राचीन काल में किसी की शिखा काट देना मृत्यु दण्ड के समान माना जाता था । लेकिन बड़े दु:ख की बात है कि आज हिन्दू लोग अपने हाथों से ही अपनी शिखा काट रहे हैं । शिखा न रखना यह गुलामी मानसिकता की पहचान है, जबकि शिखा हिन्दुत्व की पहचान है । यह हमारे धर्म और संस्कृति की रक्षक है । इतिहास गवा है शिखा के विशेष महत्व के कारण ही हिन्दुओं ने यवन शासन के दौरान अपनी शिखा की रक्षा के लिए सिर कटवा दिए, पर शिखा नहीं कटवायी । भारतीय परम्परा में प्राचीन काल से ही सिर पर चोटी रखने का विधान है, जिसका वर्णन वेदों में भी मिलता है । दक्षिण भारत में तो आधे सिर पर 'गोखुर' के समान चोटी रखते हैं । चोटी बौद्धिक विकास में बड़ी सहायक सिद्ध होती है ।*


*🔶 प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ० आई०ई० क्लार्क (एम.डी.) ने कहा है - "मैंने जब से इस विज्ञान की खोज की हैं तब से मुझे विश्वास हो गया है कि हिन्दुओं का हर एक नियम विज्ञान से परिपूर्ण है । चोटी रखना हिन्दू धर्म की मर्यादा ही नहीं, यह सुषुम्ना नाड़ी के केन्द्रों की रक्षा के लिए ऋषि-मुनियों की खोज का विलक्षण चमत्कार भी है ।"*


*🔶 इसी प्रकार पाश्चात्य विद्वान मिस्टर अर्ल थामस लिखते हैं - "सुषुम्ना की रक्षा हिन्दू लोग चोटी रखकर करते हैं, जबकि अन्य देशों में लोग सिर पर लम्बे बाल रखकर या हैट पहनकर करते हैं । इन सब में चोटी रखना सबसे लाभकारी है । किसी भी प्रकार से सुषुम्ना की रक्षा करना जरुरी है ।"*


*🔶 वास्तव में मानव शरीर को प्रकृति ने इतना सबल बनाया है कि वह बड़े से बड़े आघात को भी सहन करके रह जाता है । परन्तु शरीर में कुछ ऐसे भी स्थान हैं जिन पर आघात होने से मनुष्य की तत्काल मृत्यु हो सकती है, इन्हें मर्म स्थान कहा जाता है । शिखा के अधोभाग में भी मर्म स्थान होता है,* जिसके लिए सुश्रुताचार्य ने लिखा है -


       *मस्तकाभ्यन्तरोपरिष्टात्*

       *शिरासन्धि सन्निपातो ।*

       *रोमावर्तोऽधिपति*

       *स्तत्रपि सद्यो मरणम् ।।*


       अर्थात् मस्तक के भीतर ऊपर जहाँ बालों का आवर्त (भंवर) होता है, वहाँ सम्पूर्ण नाड़ियों व संधियों का मेल है, उसे 'अधिपति मर्म' कहा जाता है । यहाँ चोट लगने से तत्काल मृत्यु हो जाती है ।


*🔶 सुषुम्ना के मूल स्थान को 'मस्तुलिंग' कहते हैं । 'मस्तिष्क' के साथ ज्ञानेन्द्रियों - कान, नाक, जीभ, आँख आदि का सम्बन्ध है और कर्मेन्द्रियों - हाथ, पैर, गुदा, इन्द्रिय आदि का सम्बन्ध 'मस्तुलिंग' से है । मस्तिष्क व मस्तुलिंग जितने सामर्थ्यवान होते हैं, उतनी ही ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों की शक्ति बढ़ती है । मस्तिष्क ठण्डक चाहता है और मस्तुलिंग गर्मी । मस्तिष्क को ठण्डक पहुँचाने के लिए 'क्षौरकर्म' करवाना और मस्तुलिंग को गर्मी पहुँचाने के लिए 'गोखुर' के परिमाण के बाल रखना आवश्यक होता है । बाल कुचालक हैं, इसलिए चोटी के लम्बे बाल बाहर की अनावश्यक गर्मी या ठण्डक से मस्तुलिंग की रक्षा करते हैं ।*